रविवार, 21 जून 2009

साक्षात्कार

21 जून को विष्णु प्रभाकर जी का जन्म दिवस है। यदि वे जीवित होते तो हम उनका 97वाँ जन्मदिन मना रहे होते। लेकिन विधाता को यह मंजूर नहीं था और वह गत 11 अप्रैल 2009 को हमारे बीच नहीं रहे। मृत्युपर्यन्त अपनी देह का दान कर विष्णु प्रभाकर जी न जाने कितने शरीरों में मृत्यु के बाद भी जीवित हो उठेंगे। जीवनभर जिन शब्दों को वह अपने खून से सींचते रहे, वे सदियों बाद भी ‘सृजन के दीये’ की रोशनी रहेंगे। हिंदी की सुपरिचित कथाकार एवं कवयित्री अलका सिन्हा की संवेदनामयी आँखें इसी ‘रोशनी’ पर टिकी हैं, और विष्णु प्रभाकर जी के संघर्षमय जीवन के उतार-चढ़ावों की पड़ताल करते हुए उसकी तपिश में भी भीग-भीग जाती हैं। “सार्थक सृजन” के प्रथम अंक में प्रस्तुत है - मृत्यु के आँगन में जीवन से एक मार्मिक साक्षात्कार…
संपादक-“सार्थक सृजन”

“दुनिया मुझे भूल ही जाए तो अच्छा है”- विष्णु प्रभाकर

11 अप्रैल की सुबह, रोज की तरह मैं अपना मोबाइल चार्ज करने लगी, तो उस पर कोई एस एम एस आया पड़ा था। यह कोई नई बात नहीं थी, हर सुबह ही आता है, अनमने ढंग से उसे खोला तो हड़बड़ा गई। वयोवृद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर के निधन का समाचार था और अगली पंक्ति में क्रिकेट का विज्ञापन। बड़ा अजीब लगा, कम-से-कम यहाँ तो व्यापार को नजरअंदाज कर देते। विष्णु जी की ख़बर अप्रत्याशित तो नहीं, मगर तकलीफदेह थी। फिर सोचा, तकलीफदेह किसके लिए विष्णु जी के लिए, उनके परिजनों के लिए, हिंदी साहित्य के लिए या फिर हमारे लिए जो यदा-कदा उन्हें याद कर लिया करते थे। अंतरमन ने प्रश्न किया पिछली बार कब मिली कब थी उनसे, कितनी बार फोन किया था, मुझे लगता है, संवाद की प्रक्रिया तो अनियतकालीन पत्रिका-सी थी। हां, 21 जून को उनके जन्मदिन पर जरूर जाया करते थे, बहुत से लेखक-पाठक, बड़ा-सा गुलदस्ता लेकर। 15-20 मिनट बैठते थे, कुछ मीठा खा-पीकर लौट आते थे, फिर दुनिया की भीड़ में खो जाते थे। मुझे याद है, पिछले साल दिनेश मिश्र जी का फोन आया था। 21 जून को ‘इंशा’ की मासिक पत्रिका के बारे में। मैंने उन्हें असमर्थता जताई कि वह दिन तो बाबा का है, हम वहां होंगे, आना नहीं हो पाएगा। मिश्रजी ने बड़े उत्साह के साथ कहा था “आप उन पर कुछ विशेष करना चाहे, तो इंशा आपकी अपनी संस्था है।” मुझमें उल्लास भर आया था, मन योजनाएं बनाने लगा कि कैसा कार्यक्रम किया जाए जो सबसे अलग हो। आखिर वक्त बीत गया और हम अपनी योजनाओं को कार्यरूप न दे सके।

मगर उनकी योजनाएं तय थीं। बहुत तरीके से उन्होंने अपने जीने का ढंग गढ़ रखा था, जीने का ही नहीं, जाने का भी। उनके देह-दान की खबर एक अद्भुत अहसास से भरी थी। मैं काफी देर तक सोचती रही उनकी दूरदर्शिता और योजनाबद्धता पर। जो नाशवान था, उन्होंने उसे भी अर्थपूर्ण बना दिया था। साहित्य जगत में तो वे जीवित रहेंगे ही, विज्ञापन जगत में भी उनका अस्तित्व बना रहेगा, सफल शोध-कर्म के रूप में।

इस अवसर पर मुझे बार-बार उनके वे शब्द आ रहे हैं, जो उन्होंने मुझसे कहे थे, जब मैंने उनका साक्षात्कार लेने के लिए के लिए वक्त मांगा था। “क्या करोगी मेरा इंटरव्यू लेकर?” बड़ी ठहरी-सी आवाज थी, “95 वर्ष का होने चला, स्वास्थ्य भी अब ठीक नहीं रहता। कल चक्कर खाकर गिर पड़ा, बेहोश हो गया, ये दुनिया मुझे भूल ही जाए तो अच्छा है।”

उनका हर शब्द मेरे कानों में आज भी गूंजता है। मैंने बात को संभालते हुए कहा था, “आपकी तबियत जानने ही आना चाहती थी, बस आपसे मिलने।” “कभी भी आ जाओ, मैं तो घर पर ही रहता हूं। कल सुबह दस बजे।” मैंने फोन रख दिया और घर के दूसरे कामों में उलझ गई। मगर कहीं कुछ था जो मुझे बेचैन करता रहा, जैसे कहीं कोई फांस-सी चुभ गई हो, ‘दुनिया मुझे भूल ही जाए तो अच्छा है।’ यह वाक्य मुझे तरह-तरह से परेशान करता रहा। अपने समय का वरिष्ठतम साहित्यकार अगर ऐसी बात कहे तो मन में उसकी अनुगूंज स्वाभाविक ही है। शरतचंद्र की आवारगी और फक्कड़पन को मसीहे की आजादी और त्याग से जोड़ने वाला यह साहित्यकार दुनिया के सामने आज खुद अजनबी की तरह खड़ा है। तो क्या अपनी इस लंबी यात्रा और साहित्यिक पहचान से वे संतुष्ट नहीं थे?

अगली सुबह जब उनसे मिलने पहुँची, तो वे अपनी चारपाई पर तन कर बैठे, टाइपिस्ट को डिक्टेशन दे रहे थे, जो किसी पाठक के पत्र के संबंध में था। मैं पूछे बिना नहीं रह सकी, “आप हर पत्र का उत्तर देते हैं, क्या आपने ऐसा कोई प्रण लिया है?” मेरी उत्सुकता पर वे हौले से मुस्कराए, “प्रण नहीं, बस आदत सी बन गई है। फिर भी कई बार तकलीफ होती है जब लोग इस उम्र में भी मेरे पास समीक्षा के लिए अपनी किताबें भेज देते हैं या फिर किसी पुरस्कार के लिए अपनी पुस्तक पर संस्तुति प़त्र की मांग कर बैठते हैं।”

“अपने जमाने में हमने खूब काम किया, यात्राएं कीं संघर्ष किया।” वे अपनी जवानी के दिन में जा पहुँचे थे जब उन्हें बतौर क्रांतिकारी पंजाब छोड़कर जाना पड़ा था। “1919 में हमने गांधी जी की उंगली पकड़ी थी। 1926 में प्लेग का प्रकोप हुआ था, बहुत भयंकर, हमारे चाचा-चाची सब मर गए। परिवार पर भारी विपत्ति पड़ गई,” मेरी दृष्टि उनके चेहरे पर जा टिकी थी, बल्कि टटोल रही थी, दर्द की लकीरें बन-बिगड़ कर कब की मिट चुकी थीं। वहां लगभग सन्नाटा था, या फिर तूफान के बाद की शांति। “बड़े भाई कालेज में पढ़ते थे, इसलिए उन्हें किसी ने नहीं छेड़ा। हमें नौकरी करनी पड़ी। हमने दफ्तरी की नौकरी से शुरूआत कीं। अट्ठारह रूपये की नौकरी, फिर हम क्लर्क बन गए, चालीस रूपये पर। पर चालीस रूपयों में हमने वो दिन देखे हैं, जो आप आज चार लाख में भी नहीं देख सकते।”

पानी में कोई कंकड़ी-सी जा पड़ी थी और समुद्र के शांत पानी में लहरें बनने लगी थीं। स्वर की तटस्थता अचानक ही किलक पड़ी थी। “सबेरे नाश्ते में दूध के साथ पाव भर जलेबी खाते थे। एक रूपया दो आना हमारी मैट्रिक की फीस थी। एक रूपये में बीस सेर लाल गेहूं, सोलह सेर सफेद गेहूं, तीन सेर दूध…” मुझे थोड़ी दिक्कत लगने लगी, सेर-सवा सेर का हिसाब कभी पढ़ा नहीं न, इसलिए ठीक से जोड़ नहीं पा रही थी। पर इस हिसाब को पढाते हुए उनके चेहरे पर जो आह्लाद था उसका भरपूर आनन्द ले रही थी। खैर, जल्दी ही वे आटे-दाल के भाव से बाहर निकल आए। मगर चेहरे पर संघर्ष के दिनों का पसीना बरकरार था, “मैंने कौन-सा काम नहीं किया, बरतन मांजने से लेकर झाड़ू लगाने तक। रोटी बनाना, पूरी तलना। पहली बार पूरी तली तो हाथ पर छींटे लग गए।” बांया हाथ, दाएं हाथ को सहलाने लगा था। कैसा होता है बीते जीवन को याद करना। याद क्या करना, फिर से जीना, बार-बार जीना। कह नहीं सकती कि होना भी चाहिए या नहीं, मगर ये अक्स है, निगाहों में ठहर गए हैं, इनको पार किए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता। और अब मैं इंटरव्यू के इरादे से तो आई भी नहीं थी, तो मुझे हक भी कहां था कि अतीत में कुलांचे भरते मन हिरना को अपने प्रश्नों के तीर से रोकती। वो दौड़ता रहा, “खीर बनाने में मैं एक्सपर्ट था। शादी देर से की। फिर अकेले रहता था, सब सीख गया। ज़िंदगी का खूब मजा लिया। वो जमाना ही कुछ और था। तब के लोगों में बड़ी हमदर्दी थी। दुख-सुख में साथ खड़े होते थे। हम उस जमाने के पढ़े लिखे थे, अच्छा खासा डील-डाल था, अपने जमाने की बात है,” उन्हें गुदगुदी-सी महसूस हुई। लगा जैसे विशाल समुद्र में कागज की छोटी-सी नाव धीरे से थिरक पड़ी हो। कागज की नाव इसलिए कि अगले ही पल वह अथाह गहराइयों में विलीन हो गई, “हम गांधीजी के साथ रहे हमेशा, फिर हमें पंजाब छोड़ने का आर्डर हुआ, देख भई, तुझ पर बड़ी दया कर रहा हूं, तुझे जेल नहीं भेज रहा, तू पंजाब छोड़ दे”, उन्होंने सरदार जी की बात उसी लहजे में बताई, “काके तुसी अपने मेरठ में जाके कम्म करो, सानु बख्स दिओ। हम लौट आए बड़ी भयावह स्थिति थी, देश बंट गया। मगर यहीं से एक नई शुरूआत हुई। कबाईलियों ने कश्मीर पर अटैक कर दिया था, तो मंत्री जी ने हमकों बुला कर कहा कि तुम कश्मीर चले जाओ, जनता का मनोबल बढ़ाओ। तो हम लेखक लोग बारी-बारी से एक-एक महीने के लिए वहां जाते थे। जनता के बीच नाचना गाना, कहानियां सुनाना, सब करते थे, मगर वहां कई भयावह दृश्य भी देखे, यहीं से शुरू हुई एक नई कहानी। जब मैं दिसंबर में लौट कर आया तो मुझसे रेडियो वालों ने पूछा, तुमने कश्मीर में क्या-क्या देखा? उन्होंने मुझे उस पर एक रूपक लिख लाने को कहा। तब मैं रूपक के मायने भी नहीं समझता था। पहला रूपक लिखा, ‘नया कश्मीर‘, फिर और लिखे, खूब लिखे। इससे हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी हो गई। हमारी आमदनी एक हजार तक पहुँच गई। एक हजार का मतलब समझते हैं, आज के एक लाख के बराबर।”

वे फिर रूपये का मूल्य समझाने लगे, “मैंने इक्कीस रूपये तोला सोना खरीदा है…” खैर वे जल्दी ही लौट भी आए, “उन दिनों हम खूब ड्रामे लिखते थे। पूरे देश में हमारा नाम हो गया, मगर सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जो हमने चाहा नहीं, सोचा तक नहीं, वह हमें मिल गया और उसी ने हमें बनाया, मगर क्या बनाया?” एक दीर्घ निश्वास उन्हें निरंतर पीछे की ओर लिए जा रहा था। होंठ अस्फुट-से बुदबुदा रहे थे, “मैंने अपने जीवन में अपनी इच्छा से क्या किया ? मजबूरी थी, मैट्रिक पास करने के बाद नौकरी करनी पड़ी। रेडियो में काम किया, ‘शरत‘ की जीवनी लिखी।” मुझे हैरानी हुई यह जानकर कि जिस कृति ने उन्हें सबसे अधिक पहचान दी उस ‘आवारा मसीहा’ की जीवनी लिखने के लिए वे बहुत तत्पर न थे। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके प्रिय लेखक और भी थे और वे किसी की भी जीवनी लिख सकते थे। बल्कि 1957 में जब रेडियो की ओर से यह काम उन्हें दिया जा रहा था, तब उन्होंने इस ओर अपनी अनिच्छा भी व्यक्त की थी, “मेरा जवाब था, मैं तो नाटक, उपन्यास लिखता हूँ। जीवनी तो मैंने कभी लिखी नहीं।” बाबा की ये निराशा मेरी उस जिज्ञासा का उत्तर थी जिसे पूछने में मुझे संकोच हो रहा था कि आखिर एक लेखक को किसी की जीवनी की पुनर्रचना में क्या अपनी मौलिक रचना का सुख मिल सकता है? किसी जीवनी का चर्चित होना क्या किसी लेखक की मौलिक रचना की चर्चा के समकक्ष रखा जा सकता है? देर तक ‘आवारा मसीहा’ पर चर्चा चलती रही। वे शरतचंद्र के जीवन के कई प्रसंग सुनाते रहे- शराब पीने की होड़ से लेकर क्रांतिकारी जीवन की दौड़ तक।

फिर वे अपने बारे में बताने लगे, “हमारे आन्दोलन पूरे हुए, देश मिल गया। मगर बहुत बुरा लगता है मंत्रियों को देखकर। एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं, हमेशा एक-दूसरे के खिलाफ बोलते रहते हैं, बस अटल जी अच्छे आदमी हैं, बाकी सब बदमाश हैं। बेचारे सरदार जी लिबरल आदमी हैं। समझौते से फिलहाल तो नुकसान नहीं है, लेकिन आगे चलकर मुश्किल हो जाएगी,” बात राजनीति के चरित्र पर जा टिकी थी। “आपको अपने मकान के बारे में बताता हूं। मकान बनाने में काफी कर्ज हो गया था। सोचा, कुछ समय मकान को किराए पर चढ़ा देते, कुछ कर्जा ही उतर जाए। बाकायदा कान्ट्रैक्ट साइन कराया गया, मगर दो वर्ष बाद किराएदार ही मकान-मालिक बन बैठा। वह तो महाबदमाश, बेईमान आदमी निकला, हमारे मकान पर वह राज कर रहा था और पुलिस उसे छेड़ नहीं सकती थी। उसे पोलिटिकल सपोर्ट मिली हुई थी। मैं भी जाकर होम मिनिस्टर से मिला, अटल बिहारी वाजपेयी से मिला। अटल जी ने कमिश्नर को फोन कर दिया, कमिश्नर ने नीचे अधिकारियों को फोन कर दिया। बात हमारे इलाके के पुलिस स्टेशन तक जा पहुंची। उनसे पता चला कि शिवसेना का वह आदमी, जिसे मैं अपना खैरख्वाह समझ रहा था, और जिसकी सिफारिश पर में बड़े-बड़े मंत्रियों से मिल रहा था, उसी ने उस किराएदार की भी सिफारिश भेजी हुई थी। सारी कसरत बेकार हो गई, तकलीफ हुई सो अलग।”

किसी चुटकले की तरह सुनाई देता यह वाकया इस पूरी व्यवस्था और लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहा था। पंजाब से निष्कासन, कश्मीर का दर्द, देश का विभाजन और इतनी सारी कीमत अदा कर पाई हुई आजादी जैसे मुंह चिढा रही थी।

“फिर उस मकान का क्या हुआ?”
“यही तो वह मकान, जिसमें हम लोग बैठे हैं?”
मैंने लंबी सांस खींची, कि आखिर मकान तो मिला।
“मगर कैसे?”
“कैसे निकाला हमने उन्हें?” एक विद्रूप हंसी उनके चेहरे पर थी, मानो पूछना चाह रहे हो कि कर लोगी विश्वास, तो लो सुनो, “हम भी गुंडों का एक दल ले आए। उन्होंने उनका सारा सामान बाहर फेंका,” कहते हुए उन्हें शायद सफलता की खुशी के बदले असफलता की कसक महसूस हो रही थी। “यहां गुंडों का एक दल है जो पैसा लेकर कुछ भी करने को तैयार रहता है। आश्चर्य करोगी कि इसमें औरतें भी हैं। उन्होंने बताया कि इन औरतों ने तो जो शोर मचाया, गालियां बकीं और जिस तरह पीट-पीट कर इन्हें बाहर निकाला, वह सब देखने लायक था।” किराएदार तो निकल गया मगर उन्होंने इस सब के बीच यह पाया कि उपर से नीचे तक सब की फीस बंधी हैं, “चपरासी से डाइरेक्टर तक 250 से 50000 रूपये तक, सबका हिसाब है मेरे पास। जोड़-तोड़ और शार्ट-कट्स की इस दुनिया में एक आम आदमी अपने स्वाभिमान में कितने पैबंद लगता है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।”

“क्या आपको नहीं लगता कि क्रिकेटर्स की तरह लेखकों को भी अपने लिए पेंशन की मांग करनी चाहिए? मोहन राकेश के नाटक आषाढ़ का एक दिन में मल्लिका कहती है, इंदु की किरणों में उसका कलंक छिप जाता है, किन्तु दारिद्रय नहीं छिपता बल्कि एक-एक गुण को नष्ट कर देता है, उस पर छा जाता है। मुझे लगता है कि यदि लेखकों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके तो शायद वे अपने स्वाभिमान के साथ जी पाएं।” मगर बाबा ने तो बात पूरी सुने बिना ही काट दी, ‘‘ये तो होना ही नहीं चाहिए। अभी तो कुछ साहित्यकार आपस में थोड़ा बहुत मिलते भी हैं। पेंशन के लिए तो वे एक-दूसरे का गला भी काट देंगे।” बात मेरी समझ में ठीक से उतर नहीं पाई थी मगर उनकी अस्वीकृति इतनी ठोस और स्पष्ट थी कि मैंने बात वहीं छोड़ दी हालांकि मेरी प्रतिक्रिया भी उनसे छिपी न थी। तभी तो वे देर तक इस साहित्यिक राजनीति के प्रारंभ की पड़ताल करते रहे कि ‘‘हम हिन्दुस्तानियों के हालत तब खराब हुई जब मोहम्मद शाह ने जहांगीर को कैद कर लिया, फिर वह चित्तौड़ के महाराज के पास पहुंचा, फिर दिल्ली पर राज, बाबर का शासन,” पता नहीं बात कहां से कहां को जाने लगी थी, कम-से-कम मेरे हाथ से तो डोर छूट ही गई थी। मैंने फिर स्वाभिमान की तरफ रस्सी खींची, ‘‘आज कल स्वाभिमान के साथ जीने वाले को बेवकूफ समझते हैं लोग।”
‘‘क्यों बेवकूफ समझेंगे, आप जीने की कोशिश कीजिए। हमारे समय पैंतालीस रूपए में बरकत थी,” बात स्वाभिमान की गिरावट से फिर रूपयों की गिरावट पर चली आई थी।

और अब औरत की गिरावट की बारी थी। उनके जमाने से शरतचंद्र और शतरचंद्र से अब के जमाने की औरत में परिवर्तन भी तो कितना आ चुका है। ‘‘वो परदे का युग था” वो बताने लगे, ‘‘सिर से पल्ला सरक जाता तो क्या नहीं सुनने को मिलता- रंडी हो गई है क्या? शर्म नहीं आती? शरत बाबू ने उस औरत को परदे से बाहर निकाला और उसे स्वतंत्र व्यक्तित्व दिया। जब गांधी जी का युग आया तो गांधी जी ने कहा, ‘‘परदे की चिंता करोगी या लड़ोगी?” परदा खिसक कर कंधे पर आ गया। आज तो वह पूर्ण स्वतंत्र हो गई है, अब वह खुद को नंगा करती जा रही है!”

एक लंबी यात्रा रही है उनके जीवन की, लिहाजा फ्लैश बैक में चलते हुए कई चौराहे उन्हें आकर्षित करने लगते हैं। वे यकबयक किसी दूसरी पंगडंडी पर चल पड़ते, ‘‘आपको एक बार की बात बताउं, राजेन्द्र बाबू बहुत देवता आदमी थे, जबकि नेहरू जी बहुत अक्खड़। आपसे खुश न हों तो आपको झापड़ मार देंगे। 26 जनवरी के अवसर पर हम राष्ट्रपति भवन में एक समारोह करना चाहते थे। हमने राजेन्द्र बाबू से इसका आग्रह किया। वे मान गए। कार्यक्रम बहुत शानदार रहा। मंच चारों तरफ से खुला था ताकि जो रिफ्यूजी आए थे, वे भी इसमें शामिल हो सकें। कार्यक्रम सफल हो गया तो जो आर्टिस्ट थे, वे राजेन्द्र बाबू से मिलवाने का आग्रह करने लगे। मैंने पंडित जी से कहा कि ये लोग बाबू जी से मिलना चाहते हैं तो वे कहने लगे कि तुम कौन होते हो इन्हें मिलवाने वाले, प्राइम मिनिस्टर हम हैं। मैंने कहा- हां, हां आप ही मिलवाएंगे। और मैंने सभी कलाकारों को मंच पर एक-एक कर आने को कह दिया। मगर पंडित जी ने न जाने क्या समझा कि वे आपे से बाहर हो गए। कहने लगे- तुम्हें शर्म नहीं आती है, राष्ट्रपति उन लोगो से मिलने मंच पर आएगा क्या? उनका गुस्सा देखकर सभी कलाकार भाग खड़े हुए। मैं पेसोपेश में पड़ गया। मैंने जब उन्हें बताया कि मैंने तो उन्हें इसलिए इकट्ठा किया था कि वे एक-एक कर बाबूजी से मिल आएं तो पंडित जी मेरी बात से तुरंत सहमत हो गए। कहने लगे ये तो बिल्कुल ठीक था।”

एक बार उस वक्त का अध्याय क्या खुला कि देर तक उस जमाने की बातें चलती रहीं। हिंदी भाषा के प्रति उस वक्त की संवदेनशीलता की बात चली तो उन्होंने साफ तौर पर इस बात का खुलासा किया कि नेहरू जी हिन्दी के विपक्ष में नहीं थे, ‘‘नहीं-नहीं वे हिन्दी के विरोधी नहीं थे, बल्कि उन्हें गोविंद दास जी के भाषण से बड़ी चिढ़ थी। गोविंद दास जी हमेशा रोमन लिपि की गुहार लगाते रहते थे।” बाबा ने बताया कि किसी तरह का विरोध था तो वह दक्षिण की ओर से था। उसकी संस्कृति भी भिन्न थी मगर नेहरू जी हिन्दी को ‘नेचुरल भाषा’ कहते थे।

मैं महसूस कर रही थी कि आजादी, देश और भाषा के लिए लड़ने और कुर्बान हो जाने वालों की गवाही देता एक चश्मदीद गवाह मेरे सामने खड़ा था। उसके जज्बात चेहरे पर इस तरह आ-जा रहे थे मानो वह अपने पूर्वजन्म की बात बता रहा हो।

शाम का वक्त है, उसी काफी हाउस में बैठी हूँ, जहां वे कभी नियमित आया करते थे। आज भी यहां वैसा ही मजमा लगा है। चाय की चुस्की और सिगरेट के कश में दुनिया के दुख-दर्द की चर्चा छिड़ी है। दुख-तकलीफें हैं, हंसीं- ठहाके हैं, लेखक हैं, कलाकार हैं, प्रेमी-प्रेमिकाओं की जोड़ियां हैं, भीड-भाड़ है, गाड़ियों की भरमार है, यही दुनिया है- जिसके नाम एक मसीहा ने पूरी देह की वसीयत लिख दी और हौले से कहा था ‘‘दुनिया मुझे भूल ही जाए तो अच्छा है…”

समकालीन कहानी तथा कविता जगत में अपना विशेष स्थान रखने वाली कथाकार एवं कवयित्री सुश्री अलका सिन्हा की अब तक कविता की तीन पुस्तकें 'काल की कोख से', 'मैं ही तो हूँ ये' और 'तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ' तथा कहानी संग्रह 'सुरक्षित पंखों की उड़ान' प्रकाशित एवं चर्चित हैं। इसके अतिरिक्त ‘मंच संचालन’ और ‘साक्षात्कारों के लिए एक विशेष महत्व रखती हैं। 'मैं ही तो हूँ ये' कविता पुस्तक पर हिंदी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा ‘साहित्यिक कृति सम्मान’ वर्ष 2002 में प्राप्त।


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11 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Bahut maarmik aalekh hai Vishnu ji par, Alka ji ka. Aankhe num ho aayeeN. "Sarthak Srijan" ne apne pratham ank meiN Vishnu ji ko is tarah yaad kiya jana bahut achha laga. Suresh ji aapko badhayee !

ashok andrey ने कहा…

awara masiihaa jaisi rachna dene wale kathakar ko bhoolna kya sambhaw ho sakta hai beshak vishnu jee is tarah se sochne lage the hamara samaj kaisii bhii isthati ho use bhulne me mahir hai tabhii to ek mahan kathakar in vakyon me kahiin apne andar chhipe dard ko sahaj hi vaykt kar gaya
main adarniya vishnu jee ko apni vinamr shradhanjlii deta hoon

ashok andrey

Chhaya ने कहा…

विष्णु जी पर लिखा अलका जी का आलेख बहुत ही सुन्दर था..
यूँ लगा जैसे विष्णु जी से मुलाकात की हो...
एक इंसान ने जैसे कितने ही जनम जिए हों...कितनी ही सदी जी हो....
आज़ादी से लेकर अब तक आए इतने बदलाव को सहना कितना मुश्किल रहा होगा उनके लिए....
विष्णु जी के मन से अवगित करवाने का शुक्रिया अलका जी

बेनामी ने कहा…

Aadarniya Suresh Yadavji, Vishnuji ke marmik sakshatkar se apki blog patrika ki garimamay shuruat hui hai. Alkaji ki kahaniyon ki tarah hi yah sansmarnatmak lekh bhi saras hai. Subhash Neerav ki laghu kathayen bahut kasi hui aur sarthak hain. In rachnakaron ki rachnayen pahle bhi padhta raha hoon. Ranjanaji ka kavya bhi kam nahin. Aap sabhi ko bahut-bahut badhaee. -- Rajeev Ranjan, Bhopal

बेनामी ने कहा…

जीवंत संस्मरण।
-बलराम अग्रवाल

बेनामी ने कहा…

अबतक विष्णु प्रभाकर जी पर कई संसमरण पढ़ चुकी किन्तु अलका जी का यह संस्मरण अपने आप में विशिष्ट है। वह नाइजीरियाई कहावत याद आई "जब एक बूढ़ा आदमी मरता है तो एक पूरी लाइब्रेरी जल कर राख हो जाती है!"
फ़िर विष्णु जी तो असाधारण थे!
अलका जी को इस अंतरंग साक्षात्कार के लिए बधाई!
सार्थक सृजन का यह प्रथम प्रयास सार्थक रहा। आशा है भविष्य में भी ऐसा कुछ विशेष पढ़ने को मिलेगा।
इला प्रसाद
इला प्रसाद

बेनामी ने कहा…

Vishnu Prabhakar par Alka Sinha ke sansmaran ka koi jawab nahin. Mere shodh ke liye yeh bahut upyogi hai. Sampadak aur lekhika ko bahut-bahut dhanyawad.
Kamal Kumar Singh
BHU

बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा…

अलका जी,इस साक्षात्कार के लिए आप बधाई की पात्र हैं। बुद्धिनाथ मिश्र/9412992244

Devi Nangrani ने कहा…

Alka ji sakshatkar pur asar aur informative raha, Hamein agar is manch par Vishnu Prabhakar ji ke sahityik ansh padne ko mile to bahut hi acha rahega
Devi Nnagrani

shelley ने कहा…

bahut hi achchha laga. alka ji apne pathako ko anmol chiz diya hai iske madhyam se.

shelley ने कहा…

bahut hi achchha laga. alka ji apne pathako ko anmol chiz diya hai iske madhyam se.