रविवार, 21 जून 2009

कविताएं


समकालीन हिंदी कविता में अपने विशिष्ठ भाव, बिम्ब, विचार और संवेदना के चलते जिन कुछेक कवयित्रियों ने अपनी विशेष पहचान बनाई है, उनमें रंजना श्रीवास्तव एक प्रमुख नाम है। रंजना श्रीवास्तव के अब तक दो कविता संग्रह –‘चाहत धूप के टुकड़े की’, ‘सक्षम थीं लालटेनें’ और एक ग़ज़ल संग्रह -‘आईना-ए-रूह’ प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त ‘सृजन-पथ’(साहित्यिक पत्रिका) का गत कई वर्षों से संपादन-संचालन। “सार्थक सृजन” के इस प्रथम अंक में प्रस्तुत हैं- रंजना श्रीवास्तव की पाँच कविताएं…
संपादक- “सार्थक सृजन”

रंजना श्रीवास्तव की पाँच कविताएं…

चमकीली पन्नियों में लिपटा है समय
(1)
कितनी अंधी गलियों से
गुजरना है अब
खेतों की मेड़ें
जाने कहाँ खो गयीं
वो चौराहे वाला
जामुन का पेड़
वो अमरूद के बागीचे
कोई स्मृतियों वाला
गाँव है भीतर
बिल्कुल पिता के चेहरे जैसा
हमें ललचाने के
कितने फिरंगी तरीके
ईजाद हो गये हैं
चमकीली पन्नियों में
लिपटा है समय
बाज़ार की
रखवाली करता हुआ
घर भी घर की तरह
कहाँ रहे
अंगीठी की आग
रंगों वाला फाग
और तुलसी के पौधे वाले
आँगन के लिए
तरस गयी हैं आँखें
नए घड़े के
ठंडे पानी जैसी याद
हम प्यास से छटपटा रहे हैं
कड़ी धूप के एक वार में।

(2)
रूई के फाहों वाले दिन थे

फासले तय करते हैं
नज़दीकियाँ
मैने अतीत की नदी में
छोड़ दी है
मन की नाव
बचपन
बरसात बनकर
भिगो रहा है
मेरे भीतर का गाँव
कि जब हँसती थीं
तितलियाँ
अपने रंग-बिरंगे
घाघरे में
रूई के फाहों वाले
दिन थे
दालान में
बिछी चारपाइयों पर
लोटता था सूरज
हम उसे
माचिस की डिबिया में
भरकर
धूप से आँख-मिचौनी
खेला करते थे
तब माएँ कितनी
सरल हुआ करती थीं
सीधी रेखाओं वाला जीवन था
एक-दूसरे के
समानान्तर चलता हुआ
तब हमसे से कोलम्बस होना
कोई नहीं चाहता था
जेम्स वाट
पतीली से उठती हुई
भाप देखकर
समझ लेता था
चावल पकने-पकने को हैं
अब सब मिलकर बैठेंगे
सुख-दु:ख की थालियाँ
लग जायेंगी एक साथ।

(3)
तनिक ठहरो समुद्र

तनिक ठहरो समुद्र
घायल समय की
पनीली नदी में
बाकी है आँच
अभी इतना भी
मरा नहीं है आदमी
अभी खून पूरी तरह सफेद
नहीं हुआ
आँखों में बची है आग
कोई दु:ख हमें मथकर
अमृत बनाने को
लालायित है
कोई पश्चात्ताप तपकर
कुंदन होना चाहता है
अभी बाकी है
छतों पर
गौरैयों वाली शाम
तुलसी के दीये
और आँगन में घाम
तनिक स्थिर हो जाओ
समुद्र
क्रोध को पी लो
अमृत की तरह
भीतर के आवेग को
चंदन बना लो
अभी रात पूरी
तरह काली नहीं हुई
प्रतीक्षाएँ बाकी है ।


(4)
आईना नहीं लेता प्रतिशोध

आईना नहीं लेता
प्रतिशोध
बस समय का सच
रखता है समक्ष
फैसले
अपनी पृथ्वी के
नक्शे हैं
चाहो तो बदल डालो
कितनी पीड़ाएँ
खौलती हैं
ईर्ष्या के कड़ाह में
और कितना सुकून
देता है सौहार्द
समय का एक सच
यह भी है
जो कभी नहीं बदलता
हम अपने-अपने
दु:ख से कातर हैं
अपने-अपने स्वार्थों में
उलझे हुए
अपनी दुनिया के नक्शे में
मिला दो,
पूरी पृथ्वी का मानचित्र
बदल जायेगा
पूरा का पूरा समाज।

(5)
मैं अनवरत रोपती हूँ बीज

होंगी तुममें प्रतिभाएँ
मैं अनवरत
रोपती हूँ बीज
पूरी एकाग्रता से देखती हूँ
चिड़िया की आँख
लड़ती हूँ नित्य
एक महाभारत
समय के कौरवों के खिलाफ

दुर्योधन रचो तुम
कितने भी षड़यंत्र
गीता हर क्षण
मेरे हाथ में है
भीष्मों और कर्णों के भरोसे
निश्चित नहीं की जा सकतीं
सफलताएँ
अपनी ही रीढ़ की
हड्डी के सहारे
तनकर खड़ा हो सकता है
आदमी
अपने ही पैरों पर चलकर
मंजिल तक
पहुँचा जा सकता है॥
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संपर्क : श्रीपल्ली, लेन नंबर 2, पी ओ – सिलीगुड़ी बाज़ार, जिला- सिलीगुड़ी(पश्चिम बंगाल)-734 005
फोन : 09933946886
ई-मेल : ranjananishant@yahoo.co.in

4 टिप्‍पणियां:

ashok andrey ने कहा…

maine ranjna jee ki pehle bhii kavitayen padii hain achchha likhtin hain unki sari kavitaen pasand aai hain lekin unki aakhri kavita mai anvarat ropti hoon beej ek sarthak kavita ban padi hai iske liye mai aapko tatha ranjna jee ko badhai deta hoon

बेनामी ने कहा…

Suresh ji, "Sarthak Srijan" bhejne ka shukriya. Ranjana Ji ki kavitayen badi pyari lagi.unke meri subh kamna de de.
AShfaque Siddiqui, Mumbai .
ashfaqueahmed@rediffmail.com

Chhaya ने कहा…

कितना मधुर मिलन है मन की निराशा का उम्मीद से...
एक तरफ अतीत के कहीं गुम हो जाने का दुख है तो दूसरी तरफ उम्मीद है की
अभी बाकी है
छतों पर
गौरैयों वाली शाम
तुलसी के दीये
और आँगन में घाम

खूब बहुत खूब रंजना जी...

बेनामी ने कहा…

बहुत अच्छी कविताएँ।
बधाई!
इला प्रसाद