सुभाष नीरव समकालीन कथाकारों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और उनकी विशिष्ठ पहचान उनकी रचनाधर्मिता के कारण रेखांकित की जाती है। ‘दैत्य तथा अन्य
कहानियाँ’, ‘औरत होने का गुनाह’ और ‘आख़िरी पड़ाव का दु:ख’(कहानी संग्रह), ‘कथाबिंदु’ (लघुकथा संग्रह) तथा ‘यत्किंचित’, ‘रोशनी की लकीर’(कविता संग्रह) आदि मौलिक पुस्तको के रचयिता ने अपने अनुवाद द्वारा पंजाबी-हिंदी के बीच एक सार्थक ‘सेतु’ का भी निर्माण किया है। अब तक लगभग 12 पुस्तको का पंजाबी से हिंदी में अनुवाद कर चुके हैं जिनमें उनके इस महत्व को रेखांकित करने वाली प्रमुख पुस्तकें हैं- ‘काला दौर’ ‘कथा पंजाब-2’, ‘कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ’, ‘छांग्या रुक्ख(दलित आत्मकथा-बलबीर माधोपुरी) तथा ‘पाये से बंधा हुआ काल’(जतिंदर हांस का कहानी संग्रह)। नेट पर ब्लॉगों के माध्यम से उत्कृष्ठ साहित्य देकर इन्होंने अन्य ब्लॉगरों के लिए प्रेरणा का काम किया है। यहाँ प्रस्तुत हैं इनकी चुनी हुई तीन लघुकथाएं…
संपादक- “सार्थक सृजन”
तीन लघुकथाएं/ सुभाष नीरव
बीमार
“चलो, पढ़ो।”
तीन वर्षीय बच्ची किताब खोलकर पढ़ने लगी, “अ से अनाल... आ से आम...” एकाएक उसने पूछा, “पापा, ये अनाल क्या होता है ?”
“यह एक फल होता है, बेटे।” मैंने उसे समझाते हुए कहा, “इसमें लाल-लाल दाने होते हैं, मीठे-मीठे !”
“पापा, हम भी अनाल खायेंगे...” बच्ची पढ़ना छोड़कर जिद्द-सी करने लगी। मैंने उसे डपट दिया, “बैठकर पढ़ो। अनार बीमार लोग खाते हैं। तुम कोई बीमार हो ! चलो, अंग्रेजी की किताब पढ़ो। ए फॉर ऐप्पिल... ऐप्पिल माने...।”
सहसा, मुझे याद आया, दवा देने के बाद डॉक्टर ने सलाह दी थी– पत्नी को सेब दीजिये, सेब।
सेब !
और मैं मन ही मन पैसों का हिसाब लगाने लगा था। सब्जी भी खरीदनी थी। दवा लेने के बाद जो पैसे बचे थे, उसमें एक वक्त की सब्जी ही आ सकती थी। बहुत देर सोच-विचार के बाद, मैंने एक सेब तुलवा ही लिया था– पत्नी के लिए।
बच्ची पढ़ रही थी, “ए फॉर ऐप्पिल... ऐप्पिल माने सेब...”
“पापा, सेब भी बीमाल लोग खाते हैं ?... जैसे मम्मी ?...”
बच्ची के इस प्रश्न का जवाब मुझसे नहीं बन पड़ा। बस, बच्ची के चेहरे की ओर अपलक देखता रह गया था।
बच्ची ने किताब में बने सेब के लाल रंग के चित्र को हसरत-भरी नज़रों से देखते हुए पूछा, “मैं कब बीमाल होऊँगी, पापा ?”
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तिड़के घड़े का पानी
“सुनो जी, बाऊजी से कहो, लैट्रिन में पानी अच्छी तरह डाला करें। भंगन की तरह मुझे रोज साफ करनी पड़ती है।”
गुड़ुप !
“बाऊजी, देखता हूँ, आप हर समय बैठक में ही पड़े रहते हैं। कभी दूसरे कमरे में भी बैठ जाया करें। इधर कभी कोई यार-दोस्त भी आ जाता है मिलने।”
गुड़ुप !
“बाऊजी, आप तो नहाते समय कितना पानी बर्बाद करते हैं। सारा बाथरूम गीला कर देते है। पता भी है, पानी की कितनी किल्लत है।”
“अम्मा, हर समय बाऊजी के साथ क्यों चिपकी रहती हो। थोड़ा मेरा हाथ भी बटा दिया करो। सुबह-शाम खटती रहती हूँ, यह नहीं कि दो बर्तन ही मांज-धो दें।”
गुड़ुप ! गुड़ुप !!
“बाऊजी, यह क्या उठा लाए सड़ी-गली सब्जी ! एक काम कहा था आपसे, वह भी नहीं हुआ। नहीं होता तो मना कर देते, पैसे तो बर्बाद न होते।”
गुड़ुप !
“अम्मा, आपको भी बाऊजी की तरह कम दीखने लगा है। ये बर्तन धुले, न धुले बराबर हैं। जब दुबारा मुझे ही धोने हैं तो क्या फायदा आपसे काम करा कर। आप तो जाइए बैठिये बाऊजी के पास।”
गुड़ुप !
दिनभर शब्दों के अनेक कंकर-पत्थर बूढ़ा-बूढ़ी के मनों के शान्त और स्थिर पानियों में गिरते रहते हैं। गुड़ुप-सी आवाज होती है। कुछ देर बेचैनी की लहरें उठती हैं और फिर शान्त हो जाती हैं।
रोज की तरह रात का खाना खाकर, टी वी पर अपना मनपसंद सीरियल देखकर बहू-बेटा और बच्चे अपने-अपने कमरे में चले गये हैं और कूलर चलाकर बत्ती बुझाकर अपने-अपने बिस्तर पर जा लेटे हैं। पर इधर न बूढ़े की आँखों में नींद है, बूढ़ी की। पंखा भी गरम हवा फेंक रहा है।
“आपने आज दवाई नहीं खाई ?”
“नहीं, वह तो दो दिन से खत्म है। राकेश से कहा तो था, शायद, याद नहीं रहा होगा।”
“क्या बात है, अपनी बांह क्यों दबा रही हो ?”
“कई दिन से दर्द रहता है।”
“लाओ, आयोडेक्स मल दूँ।”
“नहीं रहने दो।”
“नहीं, लेकर आओ। मैं मल देता हूँ, आराम आ जाएगा।”
“आयोडेक्स, उधर बेटे के कमरे में रखी है। वे सो गये हैं। रहने दीजिए।”
“ये बहू-बेटा हमें दिन भर कोंचते क्यों रहते हैं ?” बूढ़ी का स्वर धीमा और रुआंसा-सा था।
“तुम दिल पर क्यों लगाती हो। कहने दिया करो जो कहते हैं। हम तो अब तिड़के घड़े का पानी ठहरे। आज हैं, कल नहीं रहेगें। फेंकने दो कंकर-पत्थर। जो दिन कट जाएं, अच्छा है।”
तभी, दूसरे कमरे से एक पत्थर उछला।
“अब रात में कौन-सी रामायण बांची जा रही है बत्ती जलाकर। रात में इत्ती-इत्ती देर तलक बत्ती जलेगी तो बिल ज्यादा तो आएगा ही।”
गुड़ुप !
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संपादक- “सार्थक सृजन”
तीन लघुकथाएं/ सुभाष नीरव
बीमार
“चलो, पढ़ो।”
तीन वर्षीय बच्ची किताब खोलकर पढ़ने लगी, “अ से अनाल... आ से आम...” एकाएक उसने पूछा, “पापा, ये अनाल क्या होता है ?”
“यह एक फल होता है, बेटे।” मैंने उसे समझाते हुए कहा, “इसमें लाल-लाल दाने होते हैं, मीठे-मीठे !”
“पापा, हम भी अनाल खायेंगे...” बच्ची पढ़ना छोड़कर जिद्द-सी करने लगी। मैंने उसे डपट दिया, “बैठकर पढ़ो। अनार बीमार लोग खाते हैं। तुम कोई बीमार हो ! चलो, अंग्रेजी की किताब पढ़ो। ए फॉर ऐप्पिल... ऐप्पिल माने...।”
सहसा, मुझे याद आया, दवा देने के बाद डॉक्टर ने सलाह दी थी– पत्नी को सेब दीजिये, सेब।
सेब !
और मैं मन ही मन पैसों का हिसाब लगाने लगा था। सब्जी भी खरीदनी थी। दवा लेने के बाद जो पैसे बचे थे, उसमें एक वक्त की सब्जी ही आ सकती थी। बहुत देर सोच-विचार के बाद, मैंने एक सेब तुलवा ही लिया था– पत्नी के लिए।
बच्ची पढ़ रही थी, “ए फॉर ऐप्पिल... ऐप्पिल माने सेब...”
“पापा, सेब भी बीमाल लोग खाते हैं ?... जैसे मम्मी ?...”
बच्ची के इस प्रश्न का जवाब मुझसे नहीं बन पड़ा। बस, बच्ची के चेहरे की ओर अपलक देखता रह गया था।
बच्ची ने किताब में बने सेब के लाल रंग के चित्र को हसरत-भरी नज़रों से देखते हुए पूछा, “मैं कब बीमाल होऊँगी, पापा ?”
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तिड़के घड़े का पानी
“सुनो जी, बाऊजी से कहो, लैट्रिन में पानी अच्छी तरह डाला करें। भंगन की तरह मुझे रोज साफ करनी पड़ती है।”
गुड़ुप !
“बाऊजी, देखता हूँ, आप हर समय बैठक में ही पड़े रहते हैं। कभी दूसरे कमरे में भी बैठ जाया करें। इधर कभी कोई यार-दोस्त भी आ जाता है मिलने।”
गुड़ुप !
“बाऊजी, आप तो नहाते समय कितना पानी बर्बाद करते हैं। सारा बाथरूम गीला कर देते है। पता भी है, पानी की कितनी किल्लत है।”
“अम्मा, हर समय बाऊजी के साथ क्यों चिपकी रहती हो। थोड़ा मेरा हाथ भी बटा दिया करो। सुबह-शाम खटती रहती हूँ, यह नहीं कि दो बर्तन ही मांज-धो दें।”
गुड़ुप ! गुड़ुप !!
“बाऊजी, यह क्या उठा लाए सड़ी-गली सब्जी ! एक काम कहा था आपसे, वह भी नहीं हुआ। नहीं होता तो मना कर देते, पैसे तो बर्बाद न होते।”
गुड़ुप !
“अम्मा, आपको भी बाऊजी की तरह कम दीखने लगा है। ये बर्तन धुले, न धुले बराबर हैं। जब दुबारा मुझे ही धोने हैं तो क्या फायदा आपसे काम करा कर। आप तो जाइए बैठिये बाऊजी के पास।”
गुड़ुप !
दिनभर शब्दों के अनेक कंकर-पत्थर बूढ़ा-बूढ़ी के मनों के शान्त और स्थिर पानियों में गिरते रहते हैं। गुड़ुप-सी आवाज होती है। कुछ देर बेचैनी की लहरें उठती हैं और फिर शान्त हो जाती हैं।
रोज की तरह रात का खाना खाकर, टी वी पर अपना मनपसंद सीरियल देखकर बहू-बेटा और बच्चे अपने-अपने कमरे में चले गये हैं और कूलर चलाकर बत्ती बुझाकर अपने-अपने बिस्तर पर जा लेटे हैं। पर इधर न बूढ़े की आँखों में नींद है, बूढ़ी की। पंखा भी गरम हवा फेंक रहा है।
“आपने आज दवाई नहीं खाई ?”
“नहीं, वह तो दो दिन से खत्म है। राकेश से कहा तो था, शायद, याद नहीं रहा होगा।”
“क्या बात है, अपनी बांह क्यों दबा रही हो ?”
“कई दिन से दर्द रहता है।”
“लाओ, आयोडेक्स मल दूँ।”
“नहीं रहने दो।”
“नहीं, लेकर आओ। मैं मल देता हूँ, आराम आ जाएगा।”
“आयोडेक्स, उधर बेटे के कमरे में रखी है। वे सो गये हैं। रहने दीजिए।”
“ये बहू-बेटा हमें दिन भर कोंचते क्यों रहते हैं ?” बूढ़ी का स्वर धीमा और रुआंसा-सा था।
“तुम दिल पर क्यों लगाती हो। कहने दिया करो जो कहते हैं। हम तो अब तिड़के घड़े का पानी ठहरे। आज हैं, कल नहीं रहेगें। फेंकने दो कंकर-पत्थर। जो दिन कट जाएं, अच्छा है।”
तभी, दूसरे कमरे से एक पत्थर उछला।
“अब रात में कौन-सी रामायण बांची जा रही है बत्ती जलाकर। रात में इत्ती-इत्ती देर तलक बत्ती जलेगी तो बिल ज्यादा तो आएगा ही।”
गुड़ुप !
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वाह मिट्टी
“छोनू बेटा, बाहर मिट्टी है, गंदी! गंदे हो जाओगे। घर के अन्दर ही खेलो, आं...।” जब से सोनू घुटनों के बल रेंगने लगा था, रमा उसकी चौकसी करती रहती कि वह बाहर न जाए। मिट्टी में न खेलने लगे।
“छी-छी! गंदी मिट्टी ! मिट्टी में नहीं खेलते बेटा। देखो, हो गए न गंदे हाथ-पैर! छी!” सोनू बाहर चला जाता तो रमा उसे तुरन्त उठाकर अन्दर ले आती। प्यार से समझाती-झिड़कती।
जब सोनू खड़े होकर चलने लगा तो हम पति-पत्नी बेहद खुश हुए। लेकिन, अब रमा की परेशानी और अधिक बढ़ गयी। वह न जाने कब चुपके से बाहर निकल जाता और मिट्टी में खेलने लगता। रमा खीझ उठती, “उफ्फ! मैं तो तंग आ गयी। दिन भर पकड़-पकड़कर अन्दर कमरे में बिठाती हूँ और यह बदमाश है कि न जाने कब चकमा देकर बाहर चला जाता है। ठहर, अभी लेती हूँ तेरी खबर!”
अब रमा सोनू को डांटने भी लगी थी। वह चपत दिखाते हुए उसे धमकाती, “खबरदार! अब अगर बाहर मिट्टी की तरफ झांका भी! मार पडे़गी, समझे।”
“तुझसे अन्दर बैठकर नहीं खेला जाता ? हर समय मिट्टी की तरफ ध्यान रहता है।” सोनू की हरकत से कभी-कभी मैं भी खीझ उठता।
फिर, न जाने क्या हुआ कि सोनू ने बाहर जाकर मिट्टी में खेलना तो क्या उधर झांकना भी बन्द कर दिया। दिनभर वह घर के अन्दर ही घूमता रहता। कभी इस कमरे में, कभी उस कमरे में। कभी बाहर वाले दरवाजे की ओर जाता भी तो तुरन्त ही ‘छी मित्ती!’ कहता हुआ अन्दर लौट आता। अब न सोनू हँसता था, न किलकारियाँ मारता था। हर समय खामोश और गुमसुम-सा बना रहता।
सोनू के दादा-दादी को जब इस बात की खबर हुई तो वे भी चिंतित हो उठे। उन्होंने इच्छा प्रकट की कि हम सोनू को लेकर कुछ रोज के लिए गाँव चले आएँ। मुझे और रमा को उनका प्रस्ताव अच्छा लगा। हम उसी रोज बस पकड़कर गाँव पहुँच गये।
माँ-पिताजी, छोटे भाई-बहन सभी सोनू को पाकर बेहद खुश हुए। लेकिन, सोनू था कि यहाँ आकर और अधिक गुमसुम हो गया था। वह गोद से नीचे ही नहीं उतरता था। उतारने की कोशिश करते तो रुआंसा-सा हो जाता और गोद में ही बने रहने की जिद्द करता।
तभी, पिताजी ने सोनू को अपनी गोद में उठाया और बाहर ले गये। काफी देर बाद जब पिताजी वापस घर आये तो सोनू उनके संग नहीं था।
“सोनू कहाँ है ?” हम पति-पत्नी ने चिंतित स्वर में एक साथ पूछा।
“बाहर बच्चों के संग खेल रहा है।” पिताजी ने सहज स्वर में बताया। तभी, एक जोरदार किलकारी हमारे कानों में पड़ी। हम दौड़कर बाहर गये। सोनू मिट्टी में लथपथ हुआ बच्चों के संग खेल रहा था और किलकारियाँ मार रहा था।
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लेखक संपर्क :
372, टाइप-4, लक्ष्मीबाई नगर,
नई दिल्ली-110023
ई मेल : subhashneerav@gmail.com
दूरभाष : 011-24104912(निवास)
09810534373(मोबाइल)


10 टिप्पणियां:
Dear Subhash Ji,
Namaskaar!
I read your three short stories posted in the first issue of Saarthak Srijan. I liked the stories titled
" बीमार" and वाह मिट्टी. I would like to translate these two stories into Telugu and submit to an Online Magazine. I will give you due credit as original author and my name would be mentioned as translator only. I request to permit to transalte these two stories into telugu.
Thanks and regards,
Soma Sankar
somasankar@gmail.com
प्रिय भाई सुरेश,
विष्णु जी पर अलका सिन्हा जी का आलेख अच्छा है.
बधाई,
चन्देल
प्रिय सुरेश जी,
सुभाष की पहली दोनों लघुकथाएं यद्यपि पहले भी पढ़ रखी थीं, लेकिन दोबारा पढ़कर पहले से भी अधिक सार्थक प्रतीत हुई.
वाह मिट्टी नई लघुकथाहै और बालमन को गहराई से पकड़ती है. आप और सुभाष दोनों को बधाई.
चन्देल
subhash jee ki teeno laghu katha pad kar achchha laga ve in kathaon ke madhyah se kuchh sandesh dene me bhee safal rhe hain unki in achchhi laghu kathaon ke liye mai badhai deta hoon
suresh jee aapko bhii badhai dete hoon kayonki aapne blog me achchhi rachnaon ke chayan kiya hai
ashok andrey
Good day
Thanks. shubhsh nirav ji ki lagu kataye bahut pasand aayi ,shubhash ji ki kahaniyo se bhi behtar. lekhak ko badhai
-Anjana Bakshi
anjanajnu5@yahoo.co.in
Subhash Neerav ji ki rachanayeN aksar padhti rahti hun. Man ko bahut bhati hain. Ab ye laghukathayeN hi le. 'Bimar' pahle bhi net par padhi hai, par punh padhne par ek bar phir dil ko bahut gahre chhoo gayi. 'Tidke ghade ka paani' to ghar ghar ki kahani hai jahaN budhe logoN ko isi tarah shabd vaan chalakar apmanit kiya jata hai. "Vah Mitti' apni navinta meiN ek bahut hi sunder laghukatha hai, Bal manovigyan ko rekhankit karti hui. Kabhi kabhi lagta hai, ki achhi rachnayeN aaj bhi likhi ja rahi hain, par charcha ka ve na jaane kis rajniti ke chalte kendr nahi ban pa rahi hain. Aapne 'Sarthak Srijan" ke madhayam se Sarthak Rachnaon ko pathkoN tak net ke zariye pahunchane ko jo beeda uthaya hai, vo prashanshniya hai. Asha hai, aap isi tarh sarthak aur pathniya rachnayeN pathkoN ko uplabdh karate rahenge. Meri shubhkamnayeN.
Rekha
London, Uk
email: rekha_22@rediffmail.com
सुभाष जी की पहली दो रचनाएँ पढ़ी हुई हैं और विस्मृत नहीं हुई हैं तो यह उनकी उत्कृषटता का ही प्रमाण है। अगली लघुकथा भी अच्छी लगी।
इला प्रसाद
Main balram ji ki laghukathayein hamesh padti rahi hoon aur unki kayal rahi hoon
anuthe titles se ander ki mehehk apne aap ko rokne se nahin rok pati hai,
Devi nangrani
mafi Chahti Hoon
Subhash ji ki laghu katahon ke bare mein naam ki Chook hui hai jiska sudhar chahti hoon
Main Subash ji ki laghukathayein hamesh padti rahi hoon aur unki kayal rahi hoon
anuthe titles se ander ki mehehk apne aap ko rokne se nahin rok pati hai,
Devi nangrani
yoon to sarthak srijan kee sabhee rachnaayen sundar hain par khastour par Sher jang Garg ji ke sher or subhash neerav ji kee laghu kathayen bejor hain ! sher kabhee dank se chbhte hain to kabhee zakhmon kee maa kee tarah maraham pattee bhee karte hain or neerav ji kee teenon kathayen
pathak ko bheetar tak jakjhor daaltee hain!dono rachnakaron ka hardik abhinandan!
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