बलराम अग्रवाल हिंदी के जाने-माने कथाकार हैं। अपनी सहज कथाधर्मिता के कारण इन्होंने
कथा व लघुकथा के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचानबनाई है। इनके सरसों के फूल(1994), दूसरा भीम(1997), जुबैदा(2004), चन्ना चरनदास(2004) आदि मौलिक कथा संग्रह हैं। इसके अतिरिक्त अपने कुशलसंपादन द्वारा इन्होंने हिंदी और गैर हिंदी भाषाओं के लेखकों की कथा-लघुकथाओं का संचयन कर महत्वपूर्ण कार्य किया है। इन दिनों हिन्दी ब्लॉग ‘जनगाथा’ ‘कथायात्रा’ एवं ‘लघुकथा-वार्ता’का संपादन/संचालन। यहाँ इनकी तीन चुनिंदा लघुकथाएं प्रस्तुत हैं।
संपादक 'सार्थक सृजन'
बलराम अग्रवाल की तीन लघुकथाएं
सुंदरता
लड़की ने काफी कोशिश की लड़के की नजरों को नजर-अन्दाज करने की। कभी वह दाएँ देखने लगती, कभी बाएँ। लेकिन जैसे ही उसकी नजर सामने पड़ती, लड़के को अपनी ओर घूरता पाती। उसे गुस्सा आने लगा। पार्क में और भी स्टुडैंट्स थे। कुछ ग्रुप्स में तो कुछ अकेले। सब के सब आपस की बातों में मशगूल या पढ़ाई में। एक वही था, जो खाली बैठा उसको तके जा रहा था।
गुस्सा जब हद से ऊपर चढ़ आया तो लड़की उठी और लड़के के सामने जा खड़ी हुई।
“ए मिस्टर!” वह चीखी।
वह चुप रहा और पूर्ववत ताकता रहा।
“जिन्दगी में इससे पहले कभी लड़की नहीं देखी है क्या?” उसकी ढीठता पर वह पुन: चिल्लाई।
इस बार लड़के का ध्यान टूटा। उसे पता चला कि लड़की उसी पर नाराज हो रही है।
“घर में माँ-बहन हैं कि नहीं?” लड़की फिर भभकी।
“सब हैं, लेकिन आप गलत समझ रही हैं।” इस बार वह अचकचाकर बोला, “मैं दरअसल आपको नहीं देख रहा था।”
“अच्छा!” लड़की व्यंग्यपूर्वक बोली।
“आप समझ नहीं पायेंगी मेरी बात।” वह आगे बोला।
“यानी कि मैं मूर्ख हूँ!”
“मैं खूबसूरती को देख रहा था।” उसके सवाल पर वह साफ-साफ बोला, “मैंने वहाँ बैठी निर्मल खूबसूरती को देखा, जो अब वहाँ नहीं है।”
“अब वो यहाँ है।” उसकी धृष्टता पर लड़की जोरों से फुंकारी, “बहुत शौक है खूबसूरती देखने का तो अम्मा से कहकर ब्याह क्यों नहीं करा लेते हो।”
“मैं शादी-शुदा हूँ और एक बच्चे का बाप भी।” वह बोला, “लेकिन खूबसूरती किसी रिश्ते का नाम नहीं है। किसी एक चीज या किसी एक मनुष्य में भी वह हमेशा ही कैद नहीं रहती। अब आप ही देखिए, कुछ समय पहले तक आप निर्मल सौंदर्य का सजीव झरना थीं—अब नहीं हैं।”
उसके इस बयान से लड़की झटका खा गई।
“नहीं हूँ तो न सही। तुमसे क्या?” वह बोली।
लड़का चुप रहा और दूसरी ओर कहीं देखने लगा। लड़की कुछ सुनने के इन्तजार में वहीं खड़ी रही। लड़के का ध्यान अब उसकी ओर था ही नहीं। लड़की ने खुद को घोर उपेक्षित और अपमानित महसूस किया और ‘बदतमीज कहीं का’ कहकर पैर पटकती हुई वहाँ से चली गई। 00
धागे
बुआ की बूढ़ी आँखों में आज थकान नहीं थी। न उदासी न बेबसी। उनमें आज ललक थी। घर आए अपने भतीजे पर समूचा प्यार उँड़ेल देने की ललक।
“तुझे देखकर आत्मा हरी हो गई बेटे।” देवेन के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए वह बोलीं, “जुग-जुग जीओ मेरे बच्चे।”
“मेरे मन में तुम्हारे दर्शनों की इच्छा बड़े दिनों से थी बुआ।” देवेन उनके चरण छूता हुआ बोला, “लेकिन नौकरी में ऐसा फँस गया हूँ कि मत पूछो…आज दोपहर बाद कुछ फुरसत-सी थी। बस, घर न जाकर सीधा इधर ही निकल आया। अब, रातभर तुम्हारा सिर खाऊँगा। कुछ पूछूँगा, कुछ सुनूँगा। सुनाऊँगा कुछ नहीं। सिर्फ एक घंटा सोऊँगा और सवेरे वापस चला जाऊँगा।”
उसके इस अंदाज़ पर बुआ का मन तरल हो उठा। आँखें चलक आईं। गला रुँध गया।
“क्या हुआ बुआ?” उनकी इस गंभीरता पर देवेन ने पूछा।
“कुछ नहीं।” अपने पल्लू से आँखें पोंछती बुआ बोलीं, “बिल्कुल बड़े भैया पर गया है तू। वो भी जब आते थे तो खूब बातें करते थे। सुख-दुख, प्यार-दुलार और दुनियादारी की बातें। उनके आने पर रात बहुत छोटी लगती थी। गुस्सा आता था कि सूरज इतनी जल्दी क्यों उग आया।”
भावुकताभरी उनकी इस बात पर देवेन भी अतीत में उतर गया। बुआ के बड़े भैया यानी पिताजी की स्मृति हजारों हजार फूलों की गंध-सी उसके हृदय में उतर गई। उसके उदास चेहरे को देख बुआ तो सिसक ही पड़ीं।
“भैया ने कभी भी मुझे छोटी बहन नहीं समझा, हमेशा बेटी ही माना अपनी।” सिसकते हुए ही वह बोलीं, “वो मेरा ख्याल न रखते तो इकहत्तर की लड़ाई में तेरे फूफा के शहीद हो जाने के बाद इस दुनिया में रह ही कौन गया था मेरा? अपने माँ-बाप की इकलौती संतान थे तेरे फूफा। न बाल न बच्चा। साल छ: महीने रोकर मैं भी मर-खप गई होती…।”
“ऐसी थकी और हारी हुई बातें नहीं किया करते बुआ।” अपनी उदासी पर काबू पाते हुए देवेन ने बुआ के कंधों पर अपने हाथ रखे। बोला, “जैसे पिताजी तुम्हारे लिए पिता समान थे, वैसे ही तुम हमारे लिए माँ-समान हो। एक-दूसरे को स्नेह और सहारा देते रहने की यह परम्परा अगर टूट जाने दी तो घर, घर नहीं रहेंगे बुआ, नर्क बन जाएँगे।”
देवेन की इन बातों ने बुआ के भावनाभरे मन में बवंडर-सा मचा दिया। अपने कंधों पर उसके हाथ उन्हें अपने भतीजे के नहीं, बड़े भैया के हाथों-जैसे दुलारभरे लगे। आगे बढ़कर वो उसके सीने से लग गईं और ‘भैया-भैया’ कहती फूट-फूट कर रो उठीं। 400
निवारण
राजनीतिक-गर्दिश का दौर था। संकट-निवारण के उद्देश्य से पिता ने हवन का आयोजन किया। उसमें अपने कुल-देवता की प्रतिमा को उसने हवन-स्थल पर स्थापित किया। और, प्रतिमा के एकदम बाईं ओर उसके बेटों ने एक विचित्र-सा मॉडल लाकर रख दिया।
“यह क्या है?” पिता ने पूछा।
“बचपन में संगठन के महत्व को समझाने के लिए आपने एक बार लकड़ियों के एक गट्ठर का प्रयोग किया था पिताजी।” बड़े पुत्र ने उसे बताया, “आपकी उस शिक्षा को हमने आत्मसात कर लिया। और तभी-से, आराध्य के रूप में इस ‘मॉडल’ को अपना लिया।”
“उफ्।” पिता ने अपने माथे पर हाथ मारा और वहीं बैठ गया। ‘मौजूदा संकट का कारण पार्टी के बाहर नहीं, पार्टी के भीतर, या कहूँ कि घर के ही भीतर मौजूद है…’ वह बुदबुदाया, “कुल-देवता ने बड़ी कृपा की कि सही समय पर इस सच पर से परदा हटा दिया।’ इसके साथ ही वह देवता की प्रतिमा के आगे दण्डवत बिछ गया।
“अरे मूर्खो! जो बताया जा रहा होता है, सिर्फ उसी को सुनना सीखे हो? लानत है। जो घट रहा है, गुजर रहा है, उस पर भी निगाह डालनी सीखो।…मैंने लकड़ियों का एक गट्ठर तुमको दिया था?” देवता के अभिवादन से उठते हुए वह चीखा।
“जी!” बेटों ने स्वीकारा।
“…और उसको तोड़ने के लिए बोला था?”
“जी।”
“…और जब तुममें-से कोई भी उसको न तोड़ पाया तो उस गट्ठर को खोलकर उसकी एक-एक लकड़ी को तुम्हें सौंप दिया था।” पिता बोला, “क्या हुआ था तब?”
“तब हम भाइयों ने पलक झपकते ही अपने-अपने हिस्से की लकड़ी को तोड़ डाला था।” सभी बेटे एक-स्वर में बोले।
“और तब आपने समझाया था कि एकता में ही बल है, एक रहना सीखो।” अंत में मँझले बेटे ने अपना वाक्य जोड़ा।
“चुप! चुप!!” पिता एकदम-से उस पर झल्ला उठा। बोला, “कुछ बातें बिना बोले भी कही और सुनी जाती हैं मूर्ख। मैंने बोला और तुमने सुना, बस? क्या तुमने यह नहीं देखा कि मैंने अच्छे-खासे बँधे-बँधाए गट्ठर को खोल डाला था? उसकी लकडियों को अलग-अलग कर डालने का मेरा करिश्मा तुमने नहीं देखा? एकता में शक्ति की बात भूल जाओ। याद रखो, मैंने हमेशा तुम्हें ‘खोलने और तोड़ने’ की ही शिक्षा दी है। इन दिनों गहरे संकट में फँसा हूँ। बंधनों-गठबंधनों को खोलना शुरू करो। एक-एक आदमी को तोड़ो। मेरी शिक्षा के फैलाव को पहचानो…जा…ऽ…ओ…।” 00
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कथा व लघुकथा के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचानबनाई है। इनके सरसों के फूल(1994), दूसरा भीम(1997), जुबैदा(2004), चन्ना चरनदास(2004) आदि मौलिक कथा संग्रह हैं। इसके अतिरिक्त अपने कुशलसंपादन द्वारा इन्होंने हिंदी और गैर हिंदी भाषाओं के लेखकों की कथा-लघुकथाओं का संचयन कर महत्वपूर्ण कार्य किया है। इन दिनों हिन्दी ब्लॉग ‘जनगाथा’ ‘कथायात्रा’ एवं ‘लघुकथा-वार्ता’का संपादन/संचालन। यहाँ इनकी तीन चुनिंदा लघुकथाएं प्रस्तुत हैं।संपादक 'सार्थक सृजन'
बलराम अग्रवाल की तीन लघुकथाएं
सुंदरता
लड़की ने काफी कोशिश की लड़के की नजरों को नजर-अन्दाज करने की। कभी वह दाएँ देखने लगती, कभी बाएँ। लेकिन जैसे ही उसकी नजर सामने पड़ती, लड़के को अपनी ओर घूरता पाती। उसे गुस्सा आने लगा। पार्क में और भी स्टुडैंट्स थे। कुछ ग्रुप्स में तो कुछ अकेले। सब के सब आपस की बातों में मशगूल या पढ़ाई में। एक वही था, जो खाली बैठा उसको तके जा रहा था।
गुस्सा जब हद से ऊपर चढ़ आया तो लड़की उठी और लड़के के सामने जा खड़ी हुई।
“ए मिस्टर!” वह चीखी।
वह चुप रहा और पूर्ववत ताकता रहा।
“जिन्दगी में इससे पहले कभी लड़की नहीं देखी है क्या?” उसकी ढीठता पर वह पुन: चिल्लाई।
इस बार लड़के का ध्यान टूटा। उसे पता चला कि लड़की उसी पर नाराज हो रही है।
“घर में माँ-बहन हैं कि नहीं?” लड़की फिर भभकी।
“सब हैं, लेकिन आप गलत समझ रही हैं।” इस बार वह अचकचाकर बोला, “मैं दरअसल आपको नहीं देख रहा था।”
“अच्छा!” लड़की व्यंग्यपूर्वक बोली।
“आप समझ नहीं पायेंगी मेरी बात।” वह आगे बोला।
“यानी कि मैं मूर्ख हूँ!”
“मैं खूबसूरती को देख रहा था।” उसके सवाल पर वह साफ-साफ बोला, “मैंने वहाँ बैठी निर्मल खूबसूरती को देखा, जो अब वहाँ नहीं है।”
“अब वो यहाँ है।” उसकी धृष्टता पर लड़की जोरों से फुंकारी, “बहुत शौक है खूबसूरती देखने का तो अम्मा से कहकर ब्याह क्यों नहीं करा लेते हो।”
“मैं शादी-शुदा हूँ और एक बच्चे का बाप भी।” वह बोला, “लेकिन खूबसूरती किसी रिश्ते का नाम नहीं है। किसी एक चीज या किसी एक मनुष्य में भी वह हमेशा ही कैद नहीं रहती। अब आप ही देखिए, कुछ समय पहले तक आप निर्मल सौंदर्य का सजीव झरना थीं—अब नहीं हैं।”
उसके इस बयान से लड़की झटका खा गई।
“नहीं हूँ तो न सही। तुमसे क्या?” वह बोली।
लड़का चुप रहा और दूसरी ओर कहीं देखने लगा। लड़की कुछ सुनने के इन्तजार में वहीं खड़ी रही। लड़के का ध्यान अब उसकी ओर था ही नहीं। लड़की ने खुद को घोर उपेक्षित और अपमानित महसूस किया और ‘बदतमीज कहीं का’ कहकर पैर पटकती हुई वहाँ से चली गई। 00
धागे
बुआ की बूढ़ी आँखों में आज थकान नहीं थी। न उदासी न बेबसी। उनमें आज ललक थी। घर आए अपने भतीजे पर समूचा प्यार उँड़ेल देने की ललक।
“तुझे देखकर आत्मा हरी हो गई बेटे।” देवेन के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए वह बोलीं, “जुग-जुग जीओ मेरे बच्चे।”
“मेरे मन में तुम्हारे दर्शनों की इच्छा बड़े दिनों से थी बुआ।” देवेन उनके चरण छूता हुआ बोला, “लेकिन नौकरी में ऐसा फँस गया हूँ कि मत पूछो…आज दोपहर बाद कुछ फुरसत-सी थी। बस, घर न जाकर सीधा इधर ही निकल आया। अब, रातभर तुम्हारा सिर खाऊँगा। कुछ पूछूँगा, कुछ सुनूँगा। सुनाऊँगा कुछ नहीं। सिर्फ एक घंटा सोऊँगा और सवेरे वापस चला जाऊँगा।”
उसके इस अंदाज़ पर बुआ का मन तरल हो उठा। आँखें चलक आईं। गला रुँध गया।
“क्या हुआ बुआ?” उनकी इस गंभीरता पर देवेन ने पूछा।
“कुछ नहीं।” अपने पल्लू से आँखें पोंछती बुआ बोलीं, “बिल्कुल बड़े भैया पर गया है तू। वो भी जब आते थे तो खूब बातें करते थे। सुख-दुख, प्यार-दुलार और दुनियादारी की बातें। उनके आने पर रात बहुत छोटी लगती थी। गुस्सा आता था कि सूरज इतनी जल्दी क्यों उग आया।”
भावुकताभरी उनकी इस बात पर देवेन भी अतीत में उतर गया। बुआ के बड़े भैया यानी पिताजी की स्मृति हजारों हजार फूलों की गंध-सी उसके हृदय में उतर गई। उसके उदास चेहरे को देख बुआ तो सिसक ही पड़ीं।
“भैया ने कभी भी मुझे छोटी बहन नहीं समझा, हमेशा बेटी ही माना अपनी।” सिसकते हुए ही वह बोलीं, “वो मेरा ख्याल न रखते तो इकहत्तर की लड़ाई में तेरे फूफा के शहीद हो जाने के बाद इस दुनिया में रह ही कौन गया था मेरा? अपने माँ-बाप की इकलौती संतान थे तेरे फूफा। न बाल न बच्चा। साल छ: महीने रोकर मैं भी मर-खप गई होती…।”
“ऐसी थकी और हारी हुई बातें नहीं किया करते बुआ।” अपनी उदासी पर काबू पाते हुए देवेन ने बुआ के कंधों पर अपने हाथ रखे। बोला, “जैसे पिताजी तुम्हारे लिए पिता समान थे, वैसे ही तुम हमारे लिए माँ-समान हो। एक-दूसरे को स्नेह और सहारा देते रहने की यह परम्परा अगर टूट जाने दी तो घर, घर नहीं रहेंगे बुआ, नर्क बन जाएँगे।”
देवेन की इन बातों ने बुआ के भावनाभरे मन में बवंडर-सा मचा दिया। अपने कंधों पर उसके हाथ उन्हें अपने भतीजे के नहीं, बड़े भैया के हाथों-जैसे दुलारभरे लगे। आगे बढ़कर वो उसके सीने से लग गईं और ‘भैया-भैया’ कहती फूट-फूट कर रो उठीं। 400
निवारण
राजनीतिक-गर्दिश का दौर था। संकट-निवारण के उद्देश्य से पिता ने हवन का आयोजन किया। उसमें अपने कुल-देवता की प्रतिमा को उसने हवन-स्थल पर स्थापित किया। और, प्रतिमा के एकदम बाईं ओर उसके बेटों ने एक विचित्र-सा मॉडल लाकर रख दिया।
“यह क्या है?” पिता ने पूछा।
“बचपन में संगठन के महत्व को समझाने के लिए आपने एक बार लकड़ियों के एक गट्ठर का प्रयोग किया था पिताजी।” बड़े पुत्र ने उसे बताया, “आपकी उस शिक्षा को हमने आत्मसात कर लिया। और तभी-से, आराध्य के रूप में इस ‘मॉडल’ को अपना लिया।”
“उफ्।” पिता ने अपने माथे पर हाथ मारा और वहीं बैठ गया। ‘मौजूदा संकट का कारण पार्टी के बाहर नहीं, पार्टी के भीतर, या कहूँ कि घर के ही भीतर मौजूद है…’ वह बुदबुदाया, “कुल-देवता ने बड़ी कृपा की कि सही समय पर इस सच पर से परदा हटा दिया।’ इसके साथ ही वह देवता की प्रतिमा के आगे दण्डवत बिछ गया।
“अरे मूर्खो! जो बताया जा रहा होता है, सिर्फ उसी को सुनना सीखे हो? लानत है। जो घट रहा है, गुजर रहा है, उस पर भी निगाह डालनी सीखो।…मैंने लकड़ियों का एक गट्ठर तुमको दिया था?” देवता के अभिवादन से उठते हुए वह चीखा।
“जी!” बेटों ने स्वीकारा।
“…और उसको तोड़ने के लिए बोला था?”
“जी।”
“…और जब तुममें-से कोई भी उसको न तोड़ पाया तो उस गट्ठर को खोलकर उसकी एक-एक लकड़ी को तुम्हें सौंप दिया था।” पिता बोला, “क्या हुआ था तब?”
“तब हम भाइयों ने पलक झपकते ही अपने-अपने हिस्से की लकड़ी को तोड़ डाला था।” सभी बेटे एक-स्वर में बोले।
“और तब आपने समझाया था कि एकता में ही बल है, एक रहना सीखो।” अंत में मँझले बेटे ने अपना वाक्य जोड़ा।
“चुप! चुप!!” पिता एकदम-से उस पर झल्ला उठा। बोला, “कुछ बातें बिना बोले भी कही और सुनी जाती हैं मूर्ख। मैंने बोला और तुमने सुना, बस? क्या तुमने यह नहीं देखा कि मैंने अच्छे-खासे बँधे-बँधाए गट्ठर को खोल डाला था? उसकी लकडियों को अलग-अलग कर डालने का मेरा करिश्मा तुमने नहीं देखा? एकता में शक्ति की बात भूल जाओ। याद रखो, मैंने हमेशा तुम्हें ‘खोलने और तोड़ने’ की ही शिक्षा दी है। इन दिनों गहरे संकट में फँसा हूँ। बंधनों-गठबंधनों को खोलना शुरू करो। एक-एक आदमी को तोड़ो। मेरी शिक्षा के फैलाव को पहचानो…जा…ऽ…ओ…।” 00
संपर्क : एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032 (भारत)
दूरभाष : 011-22323249 मो0 : 09968094431
ई-मेल : 2611ableram@gmail.com

8 टिप्पणियां:
भाई बलराम अग्रवाल की तीनों लघुकथाएं उत्तम हैं। नए पुराने लेखकों में कुछ ही इने-गिने लेखक हैं जो साहित्य की अन्य विधाओं के साथ साथ लघुकथा लेखन के प्रति भी गंभीर हैं उनमें से एक बलराम अग्रवाल भी हैं। लघुकथा लेखन करना इनके लिए महज औपचारिकता नहीं है। वह हिंदी लघुकथा के विकास व संवर्धन के लिए बेहद सजग और समर्पित रचनाकार हैं और निरंतर इस प्रयास में रहते हैं कि लघुकथा की शक्ति और उसकी संभावनाओं को और कैसे बढ़ाया जाए। नेट पर इनके लघुकथा पर केन्द्रित ब्लॉग्स - "लघुकथा वार्ता", "जनगाथा" और "कथायात्रा" लघुकथा के प्रति इनकी समर्पण भावना की पुष्टि करते हैं।
इन दिनों गहरे संकट में फँसा हूँ। बंधनों-गठबंधनों को खोलना शुरू करो। एक-एक आदमी को तोड़ो। मेरी शिक्षा के फैलाव को पहचानो…जा…ऽ…ओ…।” 00
बलराम तुमने कितना सुन्दर निवारण प्रस्तुत किया है. तीनों लघुकथाएं तुम्हारी लघुकथा-कला श्रेष्ठता को दर्शाती हैं.
बधाई,
चन्देल
SHREE BALRAM AGRAWAL SHEERSH
KATHAKAAR HAIN.UNKEE LAGHU KATHAAYEN PADHNA NAYE NAYE ANUBHAV
PRAPT KARNA HAI.SABHEE LAGHU
KATHAAYEN UTKRISHT HAIN.SHERJANG
GARG KEE GAZALON MEIN FRESHNESS HAI.
ACHCHHE ANK KE LIYE AAPKO BADHAAEE.
सर, आपकी बेहतरीन रचनाये पढ़के बहुत अच्छा लगा.
धन्यवाद.
रश्मि.
"satsaiyaa ke dohre jyon navak ke tir ,dekhanmen chhote lgen ghaav karen gambhir "-samaaj aur rajniti dono kaa aainaa hain aapki laghu -kathaayen satsaiyaa ke dohre si .veerubhai
बलराम अग्रवाल जी की लघुकथाओं की ताज़गी लघुकथा की ताज़गी के प्रति आश्वस्त करती है ।
balram agarwal jee ki teeno laghu kathaon ne prabhavit kiya hei lekin pehli rachna SUNDARTA NE KAHIN GEHRE CHHUA HEI
BADHAI SVIKAREN
ASHOK ANDREY
बलराम जी,
आप की लघु कथाएँ हमेशा ही बहुत गहन होती हैं. मैं स्वयं लघु कथा लिखने की चाहत रखती हूँ और हमेशा आप की लघु कथायों से बहुत कुछ ग्रहण करती हूँ.
सुन्दरता ने मेरी ही सोच की पुष्टि की. घागे ने रुला दिया और निवारण ने कमाल कर दिया--
याद रखो, मैंने हमेशा तुम्हें ‘खोलने और तोड़ने’ की ही शिक्षा दी है। इन दिनों गहरे संकट में फँसा हूँ। बंधनों-गठबंधनों को खोलना शुरू करो।
एक-एक आदमी को तोड़ो। मेरी शिक्षा के फैलाव को पहचानो…जा…ऽ…ओ…।”
बहुत -बहुत बधाई.
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