
राधेश्याम बन्धु एक जाने माने गीतकार-कवि हैं। बन्धु जी नवगीत में अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनाई है। स्वरचित और संपादित ग्रंथों के माध्यम से इन्होंने नवगीत, कविता,
संपादक 'सार्थक सृजन'
राधेश्याम बन्धु के दो नवगीत
(1) अभी परिन्दों में धड़कन है
अभी परिन्दों
में धड़कन है,
पेड़ हरे हैं जिन्दा धरती,
मत उदास
हो छाले लखकर,
ओ माझी नदिया कब थकती?
चांद भले ही बहुत दूर हो
राहों को चांदनी सजाती,
हर गतिमान चरण की खातिर
बदली खुद छाया बन जाती।
चाहे
थके पर्वतारोही,
धूप शिखर पर चढ़ती रहती।
फिर-फिर समय का पीपल कहता
बढ़ो हवा की लेकर हिम्मत,
बरगद का आशीष सिखाता
खोना नहीं प्यार की दौलत।
पथ में
रात भले घिर आये,
कभी सूर्य की दौड़ न रूकती।
कितने ही पंछी बेघर हैं
हिरनों के बच्चे बेहाल,
तम से लड़ने कौन चलेगा
रोज दिये का यही सवाल ?
पग-पग
है आंधी की साजिश,
पर मशाल की जंग न थमती।
मत उदास
हो छाले लखकर,
ओ माझी नदिया कब थकती?
(2) मोनालिसा के आलिंगन में
हम इतने
आधुनिक हो गये
अपना ही घर भूल गये,
'मोनालिसा'
के आलिंगन में
ढाई-आखर भूल गये।
शहरी राधा को गांवों की
मुरली नहीं सुहाती अब
पीताम्बर की जगह 'जीन्स' की
चंचल चाल लुभाती अब।
दिल्ली की
दारू में खोकर
घर की गागर भूल गये।
विश्वहाट की मंडी में अब
खोटे सिक्कों का शासन,
रूप-नुमाइश में जिस्मों का
सौदा करता दु:शासन।
स्मैकी
तन के तस्कर बन
सच का तेवर भूल गये।
अर्धनग्न तन के उत्सव में,
देखे कौन पिता की प्यास?
नवकुबेर बेटों की दादी
घर में काट रही बनवास।
नकली
हीरों के सौदागर
मां का जेवर भूल गये,
हम इतने
आधुनिक हो गये
अपना ही घर भूल गये।
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8 टिप्पणियां:
जब जब राधेश्याम जी के गीत पढ़े मन में ताजगी बस गई. भाषा में कनपुरिया पुट उन्हें अलग पहचान देता है.
बधाई,
चन्देल
राधेश्याम बंधु जी के दोनों गीत अछे लगे. 'सार्थक सृजन' पर नवगीत देखकर सुखद लगा.
-सुभाष नीरव
ru b ru suna hai janaab ko kai martabaa "abhi parindon men dhadkan hai ..."paryaavaran mitr rachnaa hai "veerubhai
बंधु जी,आपके तीनो गीत पढे।अच्छा प्रयास है।कभी साथ बैठें,तो इन गीतों पर गहन विचार-विमर्श हो सके। आप गीतों का ध्वज थामे हुए निरंतर आगे बढ रहे हैं,यह खुशी की बात है।मेरि शुभ कामनाएँ।
बुद्धिनाथ मिश्र, मो.9412992244
BANDHU JEE KI DONO RACHNAEN ACHCHHI LAGIN UNKI AAGE BHII AUR SUNDAR RACHNAEN PADNE KO MILENGII
BADHAI DETA HOON IN ACHCHHI RACHNAO KO PADVANE KE LIYE
नव कुबेर बेटों की दादी .........
सत्य चित्रण है यह
नवगीत मन को भा गए.
भूले तो सब कुछ हैं
भले बनना भी भूल गए
भूलना अब आदत नहीं
दौलत हो गई है।
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