शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

नवगीत




राधेश्याम बन्धु एक जाने माने गीतकार-कवि हैं। बन्धु जी नवगीत में अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनाई है। स्वरचित और संपादित ग्रंथों के माध्यम से इन्होंने नवगीत, कविता, खंडकाव्य, टेलीफिल्मों के लिए सशक्त कथानक लिखकर सृजन-जगत को समृद्ध किया है और हिन्दी अकादमी, उत्तर प्रदेश निराला साहित्य परिषद एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मानित किए गए हैं। 'समग्र चेतना' पत्रिका का संपादन निरंतर जारी है। आपके द्वारा रचित कुछ नवगीतों को प्रस्तुत कियाजा रहा है।
संपादक 'सार्थक सृजन'


राधेश्याम बन्धु के दो नवगीत

(1) अभी परिन्दों में धड़कन है

अभी परिन्दों
में धड़कन है,
पेड़ हरे हैं जिन्दा धरती,

मत उदास
हो छाले लखकर,
ओ माझी नदिया कब थकती?

चांद भले ही बहुत दूर हो
राहों को चांदनी सजाती,
हर गतिमान चरण की खातिर
बदली खुद छाया बन जाती।

चाहे
थके पर्वतारोही,
धूप शिखर पर चढ़ती रहती।

फिर-फिर समय का पीपल कहता
बढ़ो हवा की लेकर हिम्मत,
बरगद का आशीष सिखाता
खोना नहीं प्यार की दौलत।

पथ में
रात भले घिर आये,
कभी सूर्य की दौड़ न रूकती।

कितने ही पंछी बेघर हैं
हिरनों के बच्चे बेहाल,
तम से लड़ने कौन चलेगा
रोज दिये का यही सवाल ?

पग-पग
है आंधी की साजिश,
पर मशाल की जंग न थमती।

मत उदास
हो छाले लखकर,
ओ माझी नदिया कब थकती?


(2) मोनालिसा के आलिंगन में

हम इतने
आधुनिक हो गये
अपना ही घर भूल गये,

'मोनालिसा'
के आलिंगन में
ढाई-आखर भूल गये।

शहरी राधा को गांवों की
मुरली नहीं सुहाती अब
पीताम्बर की जगह 'जीन्स' की
चंचल चाल लुभाती अब।

दिल्ली की
दारू में खोकर
घर की गागर भूल गये।

विश्वहाट की मंडी में अब
खोटे सिक्कों का शासन,
रूप-नुमाइश में जिस्मों का
सौदा करता दु:शासन।

स्मैकी
तन के तस्कर बन
सच का तेवर भूल गये।

अर्धनग्न तन के उत्सव में,
देखे कौन पिता की प्यास?
नवकुबेर बेटों की दादी
घर में काट रही बनवास।

नकली
हीरों के सौदागर
मां का जेवर भूल गये,

हम इतने
आधुनिक हो गये
अपना ही घर भूल गये।
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संपर्क- बी 3/163, यमुना विहार,
दिल्ली-110053
दूरभाष- 9868444666

8 टिप्‍पणियां:

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

जब जब राधेश्याम जी के गीत पढ़े मन में ताजगी बस गई. भाषा में कनपुरिया पुट उन्हें अलग पहचान देता है.

बधाई,

चन्देल

सुभाष नीरव ने कहा…

राधेश्याम बंधु जी के दोनों गीत अछे लगे. 'सार्थक सृजन' पर नवगीत देखकर सुखद लगा.
-सुभाष नीरव

virendra sharma ने कहा…

ru b ru suna hai janaab ko kai martabaa "abhi parindon men dhadkan hai ..."paryaavaran mitr rachnaa hai "veerubhai

बुद्धिनाथमिश्र ने कहा…

बंधु जी,आपके तीनो गीत पढे।अच्छा प्रयास है।कभी साथ बैठें,तो इन गीतों पर गहन विचार-विमर्श हो सके। आप गीतों का ध्वज थामे हुए निरंतर आगे बढ रहे हैं,यह खुशी की बात है।मेरि शुभ कामनाएँ।
बुद्धिनाथ मिश्र, मो.9412992244

ashok andrey ने कहा…

BANDHU JEE KI DONO RACHNAEN ACHCHHI LAGIN UNKI AAGE BHII AUR SUNDAR RACHNAEN PADNE KO MILENGII
BADHAI DETA HOON IN ACHCHHI RACHNAO KO PADVANE KE LIYE

alka mishra ने कहा…

नव कुबेर बेटों की दादी .........
सत्य चित्रण है यह

Dr. Sudha Om Dhingra ने कहा…

नवगीत मन को भा गए.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

भूले तो सब कुछ हैं
भले बनना भी भूल गए
भूलना अब आदत नहीं
दौलत हो गई है।