शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

ग़ज़ल


डा. शेरजंग गर्ग हिंदी के एक वरिष्ठ और स्थापित रचनाकार हैं। पिछले पचास वर्षों से अपने बहु आयामी रचनात्मक कौशल का परिचय देते हुए इन्होंने गीत, ग़ज़ल, कविता, बालगीत, व्यंग्य आदि विधाओं में अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें दी हैं। इसके अलावा गीतों, ग़ज़लों की अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें संपादित भी की हैं। 'हिन्दी में काम अगणित आयाम' हिंदी भाषा परइनकी एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। राष्ट्रीय स्तर पर अनेक सम्मानप्राप्त डा0 शेरजंग गर्ग ने काव्य मंचों को गरिमा प्रदान की है।
संपादक 'सार्थक सृजन'


शेरजंग गर्ग की तीन ग़ज़लें

(1)

खुद से रूठे हैं हम लोग।
टूटे-फूटे हैं हम लोग॥

सत्य चुराता नजरें हमसे,
इतने झूठे हैं हम लोग।

इसे साध लें, उसे बाँध लें,
सचमुच खूँटे हैं हम लोग।

क्या कर लेंगी वे तलवारें,
जिनकी मूंठें हैं हम लोग।

मय-ख़्वारों की हर महफिल में,
खाली घूंटें हैं हम लोग।

हमें अजायबघर में रख दो,
बहुत अनूठे हैं हम लोग।

हस्ताक्षर तो बन न सकेंगे,
सिर्फ़ अँगूठे हैं हम लोग।

(2)

आदमी की अजब-सी हालत है।
वहशियों में ग़ज़ब की ताकत है॥

चन्द नंगों ने लूट ली महफ़िल,
और सक्ते में आज बहुमत है।

अब किसे इस चमन की चिन्ता है,
अब किसे सोचने की फुरसत है?

जिनके पैरों तले ज़मीन नहीं,
उनके सिर पर उसूल की छत है।

रेशमी शब्दजाल का पर्याय,
हर समय, हर जगह सियासत है।

वक्त के डाकिये के हाथों में,
फिर नए इंक़लाब का ख़त है।

(3)

मत पूछिये क्यों पाँव में रफ्तार नहीं है।
यह कारवाँ मंजिल का तलबगार नहीं है॥

जेबों में नहीं, सिर्फ़ गरेबान में झाँको,
यह दर्द का दरबार है बाजार नहीं है।

सुर्खी में छपी है, पढ़ो मीनार की लागत,
फुटपाथ की हालत से सरोकार नहीं है।

जो आदमी की साफ-सही शक्ल दिखा दे,
वो आईना माहौल को दरकार नहीं है।

सब हैं तमाशबीन, लगाये हैं दूरबीन,
घर फूँकने को एक भी तैयार नहीं है।
00

संपर्क- एच 43 (भूतल)
एन.डी.एस.ई.-पार्ट 2
नई दिल्ली-110049
मो. - 9811993230

12 टिप्‍पणियां:

सुभाष नीरव ने कहा…

गर्ग जी की ग़ज़लें अच्छी हैं। तीन ग़ज़लों के स्थान पर क्म से कम पांच ग़ज़लों का चयन किया करें। गर्ग जी के पास बहुत-सी उम्दा ग़ज़लें हैं, पाँच का चयन तो बहुत आसानी से हो सकता था। खैर, ये तीन ग़ज़लें ही बहुत कुछ कहती हैं और 'सार्थक सृजन' की सार्थकता को सिद्ध करती हैं।

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

सत्य चुराता नजरें हमसे,
इतने झूठे हैं हम लोग।

कितनी सादगी से अपनी बात कह जाते हैं गर्ग जी अपनी गज़लों में. सुरेश भाई इन गज़लों को पढ़वाने के लिए धन्यवाद.

चन्देल

virendra sharma ने कहा…

har shaksh apne se hi ruthaa huaa hai ,tabhi to andaar se tutaa hua hai .khud se hi naaraj hai jamaanaa .veerubhai

shama ने कहा…

Wah..! wah ! wah ! Harek rachna ke liye bas yahee nikalta hai moohse...!

"Dekhtee hain hamaree hee aankhen tamasha,hamarahee,
Ye Band hone pe hain, par khulee nahee abhee..
Hai duniyaame aisa ajab any tamashayi?"

http://shamasansmaran.blogspot.com

http://lalitlekh.blogspot.com

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http://shama-baagwaanee.blogspot.com

http://shama-kahanee.blogspot.com

हिन्दीवाणी ने कहा…

शेरजंग साहब की गजलों के क्या कहने...बस पढ़ता ही जाऊं...

हिन्दीवाणी ने कहा…

शेरजंग साहब की गजलों के क्या कहने...बस पढ़ता ही जाऊं...

anil verma ने कहा…

Satya churata nazaren humse
kitane juoothe hai hum log

Maha nagaron ki nagan sachchaai ko ujagar karta ek sher hi sau sau gazalon per bhari hai. bhadhai
anil "meet"

ashok andrey ने कहा…

sherjang jee ki gajlen padin kitne sahaj tarike se apni baat keh jaate hein yahi baat mujhe hamesha prabhavit karti rahi hei inki har gajal damdaar hei ore hamare samay ki sachchai ko sahaj hi me prastur kar deti hein
meri ore se badhai saweekar karen

ashok andrey

Ashok Kumar pandey ने कहा…

ग़ज़लें काफ़ी अच्छी हैं।

alka mishra ने कहा…

हमें अजायबघर में रख दो .......
अच्छा लगा
मुझे गजलें पढने सुनने का शौक है ,प्रतिदिन कोई न कोई गजलगो हमारे घर आता है इसे पढ़े .....
sarwatindia.blogspot.com

Dr. Sudha Om Dhingra ने कहा…

गर्ग जी की तीनों ग़ज़लें बहुत बढ़िया हैं.
खुद से रूठे हैं हम लोग।
टूटे-फूटे हैं हम लोग॥

सत्य चुराता नजरें हमसे,
इतने झूठे हैं हम लोग।
इतनी सरलता से क्या कह दिया ...
बधाई.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

शेरों के साथ जंग करती
शेरजंग जी की गजलों का
कोई सानी नहीं है
समाज की विषमताओं को
चंद शब्‍दों में उकेर देने में
सिद्धहस्‍त।