
सुश्री अंजना बख्शी समकालीन हिन्दी कविता में एक उभरता हुआ सशक्त नाम है। इनका जन्म दमोह
(मध्य प्रदेश) में 5 जुलाई 1974 में हुआ और इन्होंने एम. फिल. (हिन्दी अनुवाद), एम.सी.जे. (जनसंचार एवं पत्रकारिता) की है। देश की छोटी-बड़ी अनेक पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएं प्रकाशित हुई हैं यथा- कादम्बिनी, कथादेश, अक्षरा, जनसत्ता, राष्ट्रीय-सहारा। इसके अतिरिक्त नेपाली, तेलेगू, उर्दू, उड़िया और पंजाबी में कविताएं अनूदित। “गुलाबी रंगोंवाली वो देह” पहला कविता संग्रह वर्ष 2008 में प्रकाशित।अंजना बख्शी की तीन कविताएं
(1)बेटियाँ

बेटियाँ रिश्तों-सी पाक होती हैं
जो बुनती हैं एक शाल
अपने संबंधों के धागे से।
बेटियाँ धान-सी होती हैं
पक जाने पर जिन्हें
कट जाना होता है जड़ से अपनी
फिर रोप दिया जाता है जिन्हें
नई ज़मीन में।
बेटियाँ मंदिर की घंटियाँ होती हैं
जो बजा करती हैं
कभी पीहर तो कभी ससुराल में।
बेटियाँ पतंगें होती हैं
जो कट जाया करती हैं अपनी ही डोर से
और हो जाती हैं परायी।
बेटियाँ टेलिस्कोप-सी होती हैं
जो दिखा देती हैं– दूर की चीज़ पास।
बेटियाँ इन्द्रधनुष-सी होती हैं, रंग-बिरंगी
करती हैं बारिश और धूप के आने का इंतजार
और बिखेर देती हैं जीवन में इन्द्रधनुषी छटा।
बेटियाँ चकरी-सी होती हैं
जो घूमती हैं अपनी ही परिधि में
चक्र-दर-चक्र चलती हैं अनवरत
बिना ग्रीस और तेल की चिकनाई लिए
मकड़जाले-सा बना लेती हैं
अपने इर्द-गिर्द एक घेरा
जिसमें फंस जाती हैं वे स्वयं ही।
बेटियाँ शीरीं-सी होती हैं
मीठी और चाशनी-सी रसदार
बेटियाँ गूँथ दी जाती हैं आटे-सी
बन जाने को गोल-गोल संबंधों की रोटियाँ
देने एक बीज को जन्म।
बेटियाँ दीये की लौ-सी होती हैं सुर्ख लाल
जो बुझ जाने पर, दे जाती हैं चारों ओर
स्याह अंधेरा और एक मौन आवाज़।
बेटियाँ मौसम की पर्यायवाची हैं
कभी सावन तो कभी भादो हो जाती हैं
कभी पतझड़-सी बेजान
और ठूँठ-सी शुष्क !
(2) अम्मा का सूप

अक्सर याद आता है
अम्मा का सूप
फटकती रहती घर के
आँगन में बैठी
कभी जौ, कभी धान
बीनती ना जाने
क्या-क्या उन गोल-गोल
राई के दानों के भीतर से
लगातार लुढ़कते जाते वे
अपने बीच के अंतराल को कम करते
अम्मा तन्मय रहती
उन्हें फटकने और बीनने में।
भीतर की आवाज़ों को
अम्मा अक्सर
अनसुना ही किया करती
चाय के कप पड़े-पड़े
ठंडे हो जाते
पर अम्मा का भारी-भरकम शरीर
भट्टी की आँच-सा तपता रहता
जाड़े में भी नहीं थकती
अम्मा निरंतर अपना काम करते-करते।
कभी बुदबुदाती
तो कभी ज़ोर-ज़ोर से
कल्लू को पुकारती
गाय भी रंभाना
शुरू कर देती अम्मा की
पुकार सुनकर।
अब अम्मा नहीं रही
रह गई है शेष
उनकी स्मृतियाँ और
अम्मा का वो आँगन
जहाँ अब न गायों का
रंभाना सुनाई देता है
ना ही अम्मा की वो
ठस्सेदार आवाज़।
(3) औरतें

औरतें –
मनाती हैं उत्सव
दीवाली, होली और छठ का
करती हैं घर भर में रोशनी
और बिखेर देती हैं कई रंगों में रंगी
खुशियों की मुस्कान
फिर, सूर्य देव से करती हैं
कामना पुत्र की लम्बी आयु के लिए।
औरतें –
मुस्कराती हैं
सास के ताने सुनकर
पति की डांट खाकर
और पड़ोसियों के उलाहनों में भी।
औरतें –
अपनी गोल-गोल
आँखों में छिपा लेती हैं
दर्द के आँसू
हृदय में तारों-सी वेदना
और जिस्म पर पड़े
निशानों की लकीरें।
औरतें –
बना लेती हैं
अपने को गाय-सा
बंध जाने को किसी खूंटे से।
औरतें –
मनाती है उत्सव
मुर्हरम का हर रोज़
खाकर कोड़े
जीवन में अपने।
औरतें –
मनाती हैं उत्सव
रखकर करवाचौथ का व्रत
पति की लम्बी उम्र के लिए
और छटपटाती हैं रात भर
अपनी ही मुक्ति के लिए।
औरतें –
मनाती हैं उत्सव
बेटों के परदेस से
लौट आने पर
और खुद भेज दी जाती हैं
वृद्धाश्रम के किसी कोने में।
00
संपर्क : 207, साबरमती हॉस्टल
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी
नई दिल्ली–110067
दूरभाष : 09868615422
ईमेल : anjanajnu5@yahoo.co.in
मुस्कराती हैं
सास के ताने सुनकर
पति की डांट खाकर
और पड़ोसियों के उलाहनों में भी।
औरतें –
अपनी गोल-गोल
आँखों में छिपा लेती हैं
दर्द के आँसू
हृदय में तारों-सी वेदना
और जिस्म पर पड़े
निशानों की लकीरें।
औरतें –
बना लेती हैं
अपने को गाय-सा
बंध जाने को किसी खूंटे से।
औरतें –
मनाती है उत्सव
मुर्हरम का हर रोज़
खाकर कोड़े
जीवन में अपने।
औरतें –
मनाती हैं उत्सव
रखकर करवाचौथ का व्रत
पति की लम्बी उम्र के लिए
और छटपटाती हैं रात भर
अपनी ही मुक्ति के लिए।
औरतें –
मनाती हैं उत्सव
बेटों के परदेस से
लौट आने पर
और खुद भेज दी जाती हैं
वृद्धाश्रम के किसी कोने में।
00
संपर्क : 207, साबरमती हॉस्टल
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी
नई दिल्ली–110067
दूरभाष : 09868615422
ईमेल : anjanajnu5@yahoo.co.in

3 टिप्पणियां:
अंजना बख्शी की ये कविताएं रिश्तों की ऊष्मा से भरपूर गहरी संवेदना में पगी हैं……
पढवाने के लिए आपका आभार।
वैसे तो अंजना बख्शी की तीनों कविताएँ बहुत अच्छी हैं;परन्तु ''बेटियाँ'तथा 'औरतें'परिपक्व एवं मार्मिक कविताएँ हैं। बेटियाँ' कविता में 'धान' और 'मंदिर की घंटियाँ' के बिम्ब बहुत ही सार्थक हैं। धान की पहले पौध तैयार की जाती है , तब उसे दूसरे खेत में रोपा जाता है । सात फ़ेरों के बाद धान बिखेरने का भी कहीं-कहीं प्रचलन है । इन कविताओं की जितनी सराहना की जाए, उतना कम है । कुशल सम्पादन एवं उत्कृष्ट चयन के लिए सुरेश यादव जी को भी बधाई!
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
rdkamboj@gmail.com
Anjana jee ki sabhee kavitaen manveeya bhavon ke sarokaron se judee hue kaee sandesh detee hein hamen aue majboor karti hein kuchh sochne ko, yatha-
Aurten-
manaati hein ootsav
beton ke pardesh se
lout aane par
aur khudh bhej dee jaati hein
vriddhashram ke kisee kone men.
bahut sundar rachnaon ke liye badhai
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