
समकालीन हिन्दी साहित्य में राम कुमार आत्रेय एक जाना-पहचाना नाम है। इनके चार कविता संग्रह
‘बुझी मशालों का जुलूस’(1987), ‘बूढ़ी होती बच्ची’(1992), ‘आँधियों के खिलाफ’ तथा ‘रास्ता बदलता ईश्वर’, तीन लघुकथा संग्रह - इक्कीस जूते(1993), आँखों वाले अंधे(2000), छोटी सी बात(2007), एक कहानी-संग्रह व तीन बालकथा-संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। सम्प्रति: हरियाणा सरकार के शिक्षा-विभाग से सेवानिवृत्त।
‘बुझी मशालों का जुलूस’(1987), ‘बूढ़ी होती बच्ची’(1992), ‘आँधियों के खिलाफ’ तथा ‘रास्ता बदलता ईश्वर’, तीन लघुकथा संग्रह - इक्कीस जूते(1993), आँखों वाले अंधे(2000), छोटी सी बात(2007), एक कहानी-संग्रह व तीन बालकथा-संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। सम्प्रति: हरियाणा सरकार के शिक्षा-विभाग से सेवानिवृत्त।सम्पादक –‘सार्थक सृजन’
रामकुमार आत्रेय की दो लघुकथाएँ
पिताजी सीरियस हैं
वृद्ध पिता की आँखों की रोशनी लगभग जा चुकी थी। किसी अन्य व्यक्ति को साथ लिए बिना वह कहीं बाहर नहीं जा सकता था। डॉक्टरों ने भयंकर इंफेक्शन को मिटाने के लिए कई बार ऑप्रेशन भी किया, पर सब-कुछ निष्फल रहा। उसके एकमात्र पुत्र को भी कई दिनों तक पिता के साथ अस्पताल में रहना पड़ा था। इसके पश्चात प्रत्येक पन्द्रहवें दिन पिता को अपनी आँखें दिखाने के लिए चण्डीगढ़ जाना पड़ता था। पुत्र को उसके ऑफिस से छुट्टी न मिलने के कारण पिता को अपने किसी पड़ोसी को साथ ले जाना पड़ता। इसके लिए साथ चलने वाले का पूरा खर्च भी देना पड़ता। अनुनय-विनय भी करनी पड़ती। अहसान अलग से होता। पिता पुत्र की विवशता समझकर चुप रह जाता।
एक दिन की बात है—पिता को चण्डीगढ़ जाना था। अभी एक पड़ोसी को साथ लेकर निकलने ही वाला था कि उसे पुत्र सामने आकर पूछने लगा—“आप अभी तक गए नहीं? आठ बज चुके हैं, देर नहीं हो जाएगी क्या?”
“बस बेटा, निकल ही रहा हूँ…लेकिन आज तुम भी यहाँ हो? तुम आठ बजे से पहले ऑफिस जाने के लिए निकल जाया करते थे?” पिता ने प्रतिप्रश्न किया।
“नहीं पिताजी, आज मेरे छोटे साले का जन्मदिवस है। उसी के यहाँ जाना होगा। डाक से आया निमन्त्रण-पत्र तो आपने ही मुझे दिया था। रात उसका टेलीफोन भी आया था। रिश्तेदारी का ख्याल तो रखना ही पड़ेगा।” पुत्र ने उत्तर दिया।
“लेकिन बेटा तुम तो कह रहे थे कि तुम्हारी छुट्टियाँ ही नहीं बची हैं, तुम्हारा बॉस बहुत कड़क आदमी है? वह तो उसी ऑफिस में कार्यरत अपनी अपनी पत्नी तक को छुट्टी नहीं देता। उस बेचारी को भी सुबह नौ बजे से लेकर शाम के पाँच बजे तक मुस्तैद रहकर ड्यूटी देनी पड़ती है। लगता है आज तुम्हें विद-आउट-पे लीव लेनी पड़ी होगी?” पिता ने बात आगे बढ़ाई।
“नहीं पिताजी, विद-आउट-पे लीव नहीं ली। आज तो मैंने ऐसी चाल चली कि साला ‘न’ नहीं कर पाया।” पुत्र ने गर्व से पिता को बताया।
“ऐसी कौन-सी चाल चली तूने? मुझे भी तो बताओ बेटा।” खुश होते हुए पिता ने पूछा।
“कह दिया कि पिताजी सीरियस हैं और उन्हें चण्डीगढ़ लेकर जा रहा हूँ।” बेटे ने बताया।
पलकों से नीचे ढलक आयी आँसू की दो बूँदों को छिपाने के लिए पिताजी ने मुँह घुमा लिया।
रामकुमार आत्रेय की दो लघुकथाएँ
पिताजी सीरियस हैं
वृद्ध पिता की आँखों की रोशनी लगभग जा चुकी थी। किसी अन्य व्यक्ति को साथ लिए बिना वह कहीं बाहर नहीं जा सकता था। डॉक्टरों ने भयंकर इंफेक्शन को मिटाने के लिए कई बार ऑप्रेशन भी किया, पर सब-कुछ निष्फल रहा। उसके एकमात्र पुत्र को भी कई दिनों तक पिता के साथ अस्पताल में रहना पड़ा था। इसके पश्चात प्रत्येक पन्द्रहवें दिन पिता को अपनी आँखें दिखाने के लिए चण्डीगढ़ जाना पड़ता था। पुत्र को उसके ऑफिस से छुट्टी न मिलने के कारण पिता को अपने किसी पड़ोसी को साथ ले जाना पड़ता। इसके लिए साथ चलने वाले का पूरा खर्च भी देना पड़ता। अनुनय-विनय भी करनी पड़ती। अहसान अलग से होता। पिता पुत्र की विवशता समझकर चुप रह जाता।
एक दिन की बात है—पिता को चण्डीगढ़ जाना था। अभी एक पड़ोसी को साथ लेकर निकलने ही वाला था कि उसे पुत्र सामने आकर पूछने लगा—“आप अभी तक गए नहीं? आठ बज चुके हैं, देर नहीं हो जाएगी क्या?”
“बस बेटा, निकल ही रहा हूँ…लेकिन आज तुम भी यहाँ हो? तुम आठ बजे से पहले ऑफिस जाने के लिए निकल जाया करते थे?” पिता ने प्रतिप्रश्न किया।
“नहीं पिताजी, आज मेरे छोटे साले का जन्मदिवस है। उसी के यहाँ जाना होगा। डाक से आया निमन्त्रण-पत्र तो आपने ही मुझे दिया था। रात उसका टेलीफोन भी आया था। रिश्तेदारी का ख्याल तो रखना ही पड़ेगा।” पुत्र ने उत्तर दिया।
“लेकिन बेटा तुम तो कह रहे थे कि तुम्हारी छुट्टियाँ ही नहीं बची हैं, तुम्हारा बॉस बहुत कड़क आदमी है? वह तो उसी ऑफिस में कार्यरत अपनी अपनी पत्नी तक को छुट्टी नहीं देता। उस बेचारी को भी सुबह नौ बजे से लेकर शाम के पाँच बजे तक मुस्तैद रहकर ड्यूटी देनी पड़ती है। लगता है आज तुम्हें विद-आउट-पे लीव लेनी पड़ी होगी?” पिता ने बात आगे बढ़ाई।
“नहीं पिताजी, विद-आउट-पे लीव नहीं ली। आज तो मैंने ऐसी चाल चली कि साला ‘न’ नहीं कर पाया।” पुत्र ने गर्व से पिता को बताया।
“ऐसी कौन-सी चाल चली तूने? मुझे भी तो बताओ बेटा।” खुश होते हुए पिता ने पूछा।
“कह दिया कि पिताजी सीरियस हैं और उन्हें चण्डीगढ़ लेकर जा रहा हूँ।” बेटे ने बताया।
पलकों से नीचे ढलक आयी आँसू की दो बूँदों को छिपाने के लिए पिताजी ने मुँह घुमा लिया।
रक्तदाता
पत्नी बीमार थी। उसे रक्त दिया जाना था। उसके लिए मैं शहर के ब्लड बैंक से रक्त खरीदने चला गया। एक बीमार-सा आदमी वहाँ पहले-से ही खड़ा था। वह बूढ़ा तो नहीं था, पर बूढ़े-जैसा लग अवश्य रहा था। चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी और आँखें बुझी-बुझी-सी थीं। कपड़े भी मैले और घिसे हुए-से पहने हुए था। ब्लड बैंक के पैथोलॉजिस्ट ने उसे देखते ही झिड़क दिया—“तुम फिर आ गए? अभी तो दस दिन भी नहीं हुए हैं जब तुम खून देकर गए थे! चलो, भागो यहाँ से।”
“नहीं बाबूजी, आज तो खून ले ही लो…पैसे की बहुत जरूरत है।” वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाया।
“खून तो उसी से लिया जाता है जिसके पास खून हो। अभी तुम में खून ही नहीं है। वैसे भी, मैंने पहले भी तुम्हें बता दिया था कि तीन मास बाद ही दूसरी बार खून लिया जा सकता है। फिर आना, अब जाओ।”
“जब मेरा बेटा ही मौत के मुँह में चला जायगा, तब खून देने का क्या फायदा होगा…” वह धीमे-से बुदबुदाया, जैसे उसने अपने-आप से ही कुछ कहा हो। उसकी यह बुड़बुड़ाहट मेरे साथ-साथ पैथोलॉजिस्ट को भी सुनाई दी।
“क्या मतलब?” पैथोलॉजिस्ट पूछे बिना नहीं रह पाया।
“मेरा एक ही बेटा है…वही मरने को है…उसी की दवाई के लिए पैसे चाहिए थे…” इतना कहकर वह फूट-फूटकर रोने लगा।
अब मेरे लिए वहाँ खड़ा रह पाना असम्भव था। मैं खून की दो बोतलों के लिए जो पैसे साथ में लाया था, उन्हें उसके हाथों में थमाकर ब्लड बैंक से बाहर निकल आया।
00
सम्पर्क: मकान नं 864-ए/12, आज़ाद नगर, कुरुक्षेत्र-136119(हरियाणा)
दूरभाष: 01744237864 मोबाइल: 09416272588
पत्नी बीमार थी। उसे रक्त दिया जाना था। उसके लिए मैं शहर के ब्लड बैंक से रक्त खरीदने चला गया। एक बीमार-सा आदमी वहाँ पहले-से ही खड़ा था। वह बूढ़ा तो नहीं था, पर बूढ़े-जैसा लग अवश्य रहा था। चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी और आँखें बुझी-बुझी-सी थीं। कपड़े भी मैले और घिसे हुए-से पहने हुए था। ब्लड बैंक के पैथोलॉजिस्ट ने उसे देखते ही झिड़क दिया—“तुम फिर आ गए? अभी तो दस दिन भी नहीं हुए हैं जब तुम खून देकर गए थे! चलो, भागो यहाँ से।”
“नहीं बाबूजी, आज तो खून ले ही लो…पैसे की बहुत जरूरत है।” वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाया।
“खून तो उसी से लिया जाता है जिसके पास खून हो। अभी तुम में खून ही नहीं है। वैसे भी, मैंने पहले भी तुम्हें बता दिया था कि तीन मास बाद ही दूसरी बार खून लिया जा सकता है। फिर आना, अब जाओ।”
“जब मेरा बेटा ही मौत के मुँह में चला जायगा, तब खून देने का क्या फायदा होगा…” वह धीमे-से बुदबुदाया, जैसे उसने अपने-आप से ही कुछ कहा हो। उसकी यह बुड़बुड़ाहट मेरे साथ-साथ पैथोलॉजिस्ट को भी सुनाई दी।
“क्या मतलब?” पैथोलॉजिस्ट पूछे बिना नहीं रह पाया।
“मेरा एक ही बेटा है…वही मरने को है…उसी की दवाई के लिए पैसे चाहिए थे…” इतना कहकर वह फूट-फूटकर रोने लगा।
अब मेरे लिए वहाँ खड़ा रह पाना असम्भव था। मैं खून की दो बोतलों के लिए जो पैसे साथ में लाया था, उन्हें उसके हाथों में थमाकर ब्लड बैंक से बाहर निकल आया।
00
सम्पर्क: मकान नं 864-ए/12, आज़ाद नगर, कुरुक्षेत्र-136119(हरियाणा)
दूरभाष: 01744237864 मोबाइल: 09416272588

4 टिप्पणियां:
बेहतरीन लघुकथाएँ
रामकुमार आत्रेय जी की लघुकथा 'पिताजी सीरियस हैं' एक बेहतरीन लघुकथा है ;जो लघुकथा के मानदण्डों पर खरी उतरती है ।
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु
adar jog , ram kumar saab ki rachnaye vaise hi utkrash hoti hai.. bahut hi satik hai laghu katha.. bavishay me esi prakar ki or rachnao ki kamna karte hai.
sunil gajjani
Ram Kumar attre jee ki achchhi laghu kathaon ko padvaane ke liye dhanyavaad
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