
सम्पादकीय
सार्थक सृजन के पाठकों/रचनाकारों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ! इस नए वर्ष में ‘सार्थक सृजन’ यह आशा करता है कि हिंदी साहित्य जगत अपनी तमाम गुटबाजियों और कमजोरियों से ऊपर उठाकर मूल्यवान साहित्य का सम्मान करेगा और उसके व्यापक प्रचार-प्रसार में सहयोग करेगा. हिंदी भाषा एवं साहित्य अपनी प्रगति के इस मुकाम पर पहुँच चुका है, जहाँ इस जिम्मेंदारी का निर्वहन अपरिहार्य हो गया है. हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि दस अलग अलग रचनाकार- समीक्षकों से बीस श्रेष्ठ कवियों अथवा कहानीकारों के बारे पूछा जाये तो बहुत संभव है कि उसकी संख्या बीस से बढ़कर दो सौ हो जाये. यानी "आठ कन्नोजिया नौ चूल्हे" वाली बात पूरी तरह चरितार्थ होती है. ऐसा शायद ही किसी अन्य भारतीय भाषा या विश्व भाषा में होता हो. इस सबके पीछे मेरी यही भावना है कि चाहे पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अथवा हिंदी ब्लोगों के माध्यम से मूल्यवान साहित्य अवश्य सुधि जनों तक पहुँचना चाहिए. यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि कुछ ब्लॉग बहुत ही सार्थक प्रयास कर रहे हैं और अच्छा साहित्य सामने ला रहे हैं. सबसे ख़ुशी की बात यह है कि हिंदी साहित्य यहाँ विश्व परिवार में एक महत्वपूर्ण के रूप में दिखाई देता है. 'सार्थक सृजन' की मामूली सी पहल भी इस दिशा में यदि सहयोग करती है तो मेरे लिए गर्व की बात है. 'सार्थक सृजन' के इस अंक में सुश्री अंजना बक्षी की तीन कवितायेँ और श्री रामकुमार आत्रेय की दो लघुकथाएं प्रस्तुत कर रहे हैं. ‘सार्थक सृजन’ के इस नए वर्ष के पहले अंक में प्रस्तुत की जा रही रचनाओं में आप संवेदनाओं और विचार की ताजगी को महसूस करेंगे. आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी.
सुरेश यादव
सम्पादक - 'सार्थक सृजन
सार्थक सृजन के पाठकों/रचनाकारों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ! इस नए वर्ष में ‘सार्थक सृजन’ यह आशा करता है कि हिंदी साहित्य जगत अपनी तमाम गुटबाजियों और कमजोरियों से ऊपर उठाकर मूल्यवान साहित्य का सम्मान करेगा और उसके व्यापक प्रचार-प्रसार में सहयोग करेगा. हिंदी भाषा एवं साहित्य अपनी प्रगति के इस मुकाम पर पहुँच चुका है, जहाँ इस जिम्मेंदारी का निर्वहन अपरिहार्य हो गया है. हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि दस अलग अलग रचनाकार- समीक्षकों से बीस श्रेष्ठ कवियों अथवा कहानीकारों के बारे पूछा जाये तो बहुत संभव है कि उसकी संख्या बीस से बढ़कर दो सौ हो जाये. यानी "आठ कन्नोजिया नौ चूल्हे" वाली बात पूरी तरह चरितार्थ होती है. ऐसा शायद ही किसी अन्य भारतीय भाषा या विश्व भाषा में होता हो. इस सबके पीछे मेरी यही भावना है कि चाहे पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अथवा हिंदी ब्लोगों के माध्यम से मूल्यवान साहित्य अवश्य सुधि जनों तक पहुँचना चाहिए. यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि कुछ ब्लॉग बहुत ही सार्थक प्रयास कर रहे हैं और अच्छा साहित्य सामने ला रहे हैं. सबसे ख़ुशी की बात यह है कि हिंदी साहित्य यहाँ विश्व परिवार में एक महत्वपूर्ण के रूप में दिखाई देता है. 'सार्थक सृजन' की मामूली सी पहल भी इस दिशा में यदि सहयोग करती है तो मेरे लिए गर्व की बात है. 'सार्थक सृजन' के इस अंक में सुश्री अंजना बक्षी की तीन कवितायेँ और श्री रामकुमार आत्रेय की दो लघुकथाएं प्रस्तुत कर रहे हैं. ‘सार्थक सृजन’ के इस नए वर्ष के पहले अंक में प्रस्तुत की जा रही रचनाओं में आप संवेदनाओं और विचार की ताजगी को महसूस करेंगे. आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी.
सुरेश यादव
सम्पादक - 'सार्थक सृजन

8 टिप्पणियां:
आपका कार्य वाकई प्रशंसनीय है. एक साथ आपने सभी विधाओं को स्थान दिया है. बधाई स्वीकारें.
आपका कार्य वाकई प्रशंसनीय है. एक साथ आपने सभी विधाओं को स्थान दिया है. बधाई स्वीकारें.
नई उर्जा से भरपूर रचनाएँ..स्वागत है.
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शब्द सृजन की ओर पर पढ़ें- "लौट रही है ईस्ट इण्डिया कंपनी".
शुक्रिया सुरेश जी ......आपका '' चिमनी पे टंगा चाँद'' पढने की अभिलाषा है .....!!
रंजन रस रंजन..रोचक मनोरोचक ..
होली की ढेरों शुभकामनाएं
हरकीरत जी ,आप ने मेरे नए काव्य संकलन 'चिमनी पर टंगा चाँद 'पढ़ने की इच्छा जताई है मेरे लिए ख़ुशी की बात है.किस तरह आप तक pahunchaun .धन्यवाद
सुरेश जी , सार्थक सृजन का यह अंक भी बहुत अच्छा है | अंजना जी की कवितायें प्रभावित करती हैं | लघुकथाएं सच का सीधा बयान हैं |
इला
मैंने आपकी वेबसाइट पर प्रकाशित रचनाएँ पढ़ीं। बहुत सुन्दर कविता, कहानियां लगीं।
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