
अशोक भाटिया समकालीन हिन्दी लघुकथा का एक बहुचर्चित और प्रतिष्टित नाम है। मानवीय संबंधों पर बहुत मारक लघुकथाएं इन्होंने दी हैं। लघुकथा विधा के विकास में इनका बहुमूल्य योगदान रहा है। “जंगल में आदमी” मौलिक लघुकथा संग्रह के अलावा इन्होंने लघुकथा से संबंधित अनेक पुस्तकों का
सम्पादन किया है जिनमें “हिन्दी की पैंसठ लघुकथाएं” और “निर्वाचित लघुकथाएं” प्रमुख हैं। हिन्दी में मौलिक लेखन के साथ साथ पंजाबी से हिन्दी अनुवाद कार्य से भी पिछ्ले अनेक वर्षों से जुड़े हैं। ‘पंजाबी की श्रेष्ठ लघुकथाएं’ नामक इनके द्वारा संपादित और अनूदित पुस्तक है। हिन्दी पंजाबी लघुकथा क्षेत्र में किए गए महती कार्यों के लिए अनेक पुरस्कारों/सम्मानों से सम्मानित।
सम्पादक – ‘सार्थक सृजन’
सम्पादक – ‘सार्थक सृजन’
अशोक भाटिया की चार लघु कथाएं
रिश्ते
वह आम बस थी और सरूप् सिंह आम ड्राइवर था। सवारियों ने सोचा था कि भीड़-भाड़ से बाहर आकर बस तेज हो जाएगी, पर ऐसा नहीं हुआ। सरूप सिंह के हाथ आज सख्त ही नहीं, मुलायम भी थे। भारी ही नहीं, हल्के भी थे। उसका दिल आज बहुत पिघल रहा था, वह कभी बस को, कभी सवारियों को और कभी बाहर पेड़ों को देखने लगता, जैसे वहाँ कुछ खास बात हो। कंडक्टर इस राज को जनता था। लेकिन सवारियाँ धीमी गति से परेशान हो उठीं।
''ड्राइवर साहब, ज़रा तेज चलाओ, आगे भी जाना है'', एक ने तीखेपन से कहा।
सरूप सिंह ने मिठास घोलते हुए कहा, ''आज तक मेरी बस का एक्सीडेंट नहीं हुआ।''
इस पर सवारियाँ उत्तेजित हो गयीं। दो-चार ने आगे-पीछे कहा, ''इसका मतलब यह नहीं कि बीस-तीस पे ढीचम-ढीचम चलाओ।''
कोशिश करके भी सरूप सिंह बस तेज नहीं कर पा रहा था। उसने बढ़ते हुए शोर में बस रोक दी। अपना छलकता चेहरा घुमाकर बोला, ''बात यह है कि इस रास्ते से मेरा तीस सालों का रिश्ता है। आज में यह आखिरी बार बस चला रहा हूँ। बस के मुकाम पर पहुंचते ही मैं रिटायर हो जाउँगा, इसलिए...'' कहते हुए उसने एक्सीलेटर पर अपने पैर का दबाब बढ़ा दिया।
तीसरा चित्र
वृद्ध ने अपने कलाकार पुत्र का बुलाकर कहा- “बेटा, तुझे मैंने जितनी शिक्षा-दीक्षा देनी थी, दे चुका। अब एक बार बच्चों पर तीन चित्र बनाकर मुझे दिखा दे, तो मेरी चिन्ता दूर हो।”
पिता परीक्षा लेना चाहते हैं, बेटा जानता था। चित्र बनाकर उनके पास ले गया।
पहला चित्र बहुत अमीर और स्वस्थ बच्चे का था। बच्चा नौकर की गोद में था। पिता बोले- “वाह ! रौब और अमीरी में भी बच्चे के चेहरे से अंसतोष का भाव तुमने बखूब दिखाया है। पृष्ठभूमि में कार और वह बिना पत्तों का छोटा पेड़ बहुत कुछ कह रहे हैं।”
दूसरा चित्र मध्यमवर्गीय बच्चे का था। पिता बोले- “माता -पिता का हाथ पकड़कर खड़ा यह बच्चा अपने मन की हालत खुद कह रहा है। बच्चे को सुन्दर कपड़े पहना कर माता-पिता कितने खुश हैं, मानो उनका फर्ज इसी में पूरा हो गया हो।”
“और पिताजी यह तीसरा चित्र !” पुत्र ने आखिरी चित्र आगे बढ़ाया।
पिता ने देखा तो देखते ही रह गए। बोले- “वाह ! तुमने तो चित्र में जैसे जान फूँक दी है। मिट्टी के ढेर पर बैठा हुआ यह दुबला बच्चा कितना सहज लग रहा है। हवा में बिखरे बालों में से झांकती चमकीली आँखें कितनी अर्थपूर्ण हैं। जेब में मिट्टी भरकर उस पर हाथ यूं रखा है, जैसे उसमें हीरे भरे हों। मिट्टी-भरा हाथ यूं बढ़ा रहा है जैसे हमें खेलने के लिए बुला रहा हो। अच्छा एक बात तो बताओ।”
“जी पूछिए।”
पिता ने पूछा- “पहले दोनों चित्र तुमने गीले रंगों से बनाए हें, लेकिन इस चित्र को पैंसिल से क्यों बनाया है?”
“पिताजी, इसकी बारी आई तो सब रंग खत्म हो चुके थे।” बेटे ने बताया।
कपों की कहानी
''ड्राइवर साहब, ज़रा तेज चलाओ, आगे भी जाना है'', एक ने तीखेपन से कहा।
सरूप सिंह ने मिठास घोलते हुए कहा, ''आज तक मेरी बस का एक्सीडेंट नहीं हुआ।''
इस पर सवारियाँ उत्तेजित हो गयीं। दो-चार ने आगे-पीछे कहा, ''इसका मतलब यह नहीं कि बीस-तीस पे ढीचम-ढीचम चलाओ।''
कोशिश करके भी सरूप सिंह बस तेज नहीं कर पा रहा था। उसने बढ़ते हुए शोर में बस रोक दी। अपना छलकता चेहरा घुमाकर बोला, ''बात यह है कि इस रास्ते से मेरा तीस सालों का रिश्ता है। आज में यह आखिरी बार बस चला रहा हूँ। बस के मुकाम पर पहुंचते ही मैं रिटायर हो जाउँगा, इसलिए...'' कहते हुए उसने एक्सीलेटर पर अपने पैर का दबाब बढ़ा दिया।
तीसरा चित्र
वृद्ध ने अपने कलाकार पुत्र का बुलाकर कहा- “बेटा, तुझे मैंने जितनी शिक्षा-दीक्षा देनी थी, दे चुका। अब एक बार बच्चों पर तीन चित्र बनाकर मुझे दिखा दे, तो मेरी चिन्ता दूर हो।”
पिता परीक्षा लेना चाहते हैं, बेटा जानता था। चित्र बनाकर उनके पास ले गया।
पहला चित्र बहुत अमीर और स्वस्थ बच्चे का था। बच्चा नौकर की गोद में था। पिता बोले- “वाह ! रौब और अमीरी में भी बच्चे के चेहरे से अंसतोष का भाव तुमने बखूब दिखाया है। पृष्ठभूमि में कार और वह बिना पत्तों का छोटा पेड़ बहुत कुछ कह रहे हैं।”
दूसरा चित्र मध्यमवर्गीय बच्चे का था। पिता बोले- “माता -पिता का हाथ पकड़कर खड़ा यह बच्चा अपने मन की हालत खुद कह रहा है। बच्चे को सुन्दर कपड़े पहना कर माता-पिता कितने खुश हैं, मानो उनका फर्ज इसी में पूरा हो गया हो।”
“और पिताजी यह तीसरा चित्र !” पुत्र ने आखिरी चित्र आगे बढ़ाया।
पिता ने देखा तो देखते ही रह गए। बोले- “वाह ! तुमने तो चित्र में जैसे जान फूँक दी है। मिट्टी के ढेर पर बैठा हुआ यह दुबला बच्चा कितना सहज लग रहा है। हवा में बिखरे बालों में से झांकती चमकीली आँखें कितनी अर्थपूर्ण हैं। जेब में मिट्टी भरकर उस पर हाथ यूं रखा है, जैसे उसमें हीरे भरे हों। मिट्टी-भरा हाथ यूं बढ़ा रहा है जैसे हमें खेलने के लिए बुला रहा हो। अच्छा एक बात तो बताओ।”
“जी पूछिए।”
पिता ने पूछा- “पहले दोनों चित्र तुमने गीले रंगों से बनाए हें, लेकिन इस चित्र को पैंसिल से क्यों बनाया है?”
“पिताजी, इसकी बारी आई तो सब रंग खत्म हो चुके थे।” बेटे ने बताया।
कपों की कहानी
आज फिर ऐसा ही हुआ । वह चाय बनाने रसोई में गया, तो उसे फिर वही बात याद आ गई। उसे फिर चुभन हुई कि उसने ऐसा क्यों किया?
दरअसल उसके घर की सीवरेज पाइप कुछ दिन से रूकी हुई थी। आप जानते हैं कि ऐसी स्थिति में व्यक्ति घर में सहज रूप में नहीं रह पाता। यह आप भी मानेंगे कि यदि जमादार न होते, तो हम सचमुच नरक में रह रहे होते। खैर ! दो जमादार जब सीवरेज खोलने के लिए आ गए, तो उसकी सांस में सांस आई। वे दोनों पहले भी इसी काम के लिए आ चुके हैं। एक आदमी थक जाता, तो दूसरा बांस लगाने लगता। कितना मुश्किल काम है ! वह कुछ देर पास खड़ा रहा, फिर दुर्गंध के मारे भीतर चला गया। सोचने लगा कि इनके प्रति सवर्णों का व्यवहार आज भी कहीं-कहीं ही समानताभरा दीखता है। नहीं तो अधिकतर अमानवीय व्यवहार ही होता है। इतिहास तो जातिवादी व्यवस्था का गवाह है ही, आज भी हम सवर्ण इनके प्रति नफरत दिखाकर ही अपने में गर्व अनुभव करते हैं। यह संकीर्णता नहीं तो और क्या है?
उसके मन में ऐसा बहुत कुछ उमड़ रहा था कि बाहर से आवाज आई, ''बाउजी, आकर देख लो!'' वह उत्साह से बाहर गया। पाइप साफ हो चुकी थी।
''बोलो, पानी या फिर चाय!'' उसने पूछा।
''पहले साबुन से हाथ धुला दो !'' वे बोले। शायद वे उसकी उदारता को जानते हैं। वह उनके प्रति अपनी उदारता को याद कर खुश होने लगा। हाथ धुलवाते हुए उसने जान-बूझकर दोनों के हाथों को स्पर्श किया ताकि उन पर उसकी उदारता का सिक्का जमने में कोई कसर न रहा जाए। पैसे तो पूरे देगा ही, पर लगे हाथ एक अवसर मिल गया। बोला, ''एक बार साबुन लगाने से हाथ की बदबू नहीं जाती। रसोई की नाली रूकी थी, तो मैंने कल हाथ से गंद निकाला था। उसके बाद तीन बार हाथ धोए तब जाकर बदबू गई।''
''बाउजी, हमारा तो रोज का यही काम है। थोड़ी चाय पिला दो।''
वह यही सुनना चाहता था। यह तो मामूली बात है। इनके प्रति हमारे पूर्वजों द्वारा किए अन्याय के प्रायश्चित के रूप में हमें बहुत कुछ करना चाहिए। लेकिन क्या ?-यह वह कभी नहीं सोच पाए।
वह रसोई में बड़े उत्साह के साथ चाय बनाने में जुट गया। चाय का सामान डालकर उसने तीन कप निकाले। एक कप बड़ा लिया और दो छोटे, फिर सोचा, 'यह भेदभाव ठीक नहीं। उन्हें चाय की जरूरत मुझसे ज्यादा है।' सोचकर उसने तीनों एक-से कप उठाए। ऐसे और कई कप रखे थे, लेकिन उसने एक कप साबूत लिया और दो ऐसे लिए जिनमें क्रैक पड़े हुए थे।
उधर चाय में उफान आया, तो उसने फौरन आंच धीमी कर दी।
असली खुशी
वह सुबह देरी से उठा। उसके चेहरे पर कल के एक दिवसीय अंतर्राष्ट्र्टीय क्रिकेट में जमाए डेढ़ सौ रनों, बनाए गए मैन ऑफ द मैच और मनाए गए जश्न की खुशी और सुख की नदी बह रही थीं। किंतु असली खुशी की उसे अभी प्रतीक्षा थी।
अधिकतर अखबारों में पहले पृष्ठ पर उसके रंगीन फोटो थे, वह नए मैच-जिताउ खिलाड़ी के रूप में उभारा गया था। उसने चाय की चुस्की के साथ जल्दी-जल्दी अखबारों में अपने फोटो देखे, खबर पढ़ी और अपना कद अखबारों के इंचीटेप से नापा। उसे लगा वह राष्ट्रीय टीम के बड़े खिलाड़ियों के कद के बराबर पहुंचने वाला है। फिर भी, उसे असली खुशी की प्रतीक्षा थी। इसी प्रतीक्षा में शाम हो गई तो उसने अपने सेक्रेटरी से पूछा, ''किसी कंपनी से फोन आया?''
''सारी सर, ऐड के लिए इस बार भी किसी कंपनी ने कांटेक्ट नहीं किया।''
यह सुनकर उसका चेहरा जीरो पर बोल्ड होने वाले खिलाड़ी जैसा हो गया !
00
संपर्क: 1882, सेक्टर, 13, अरबन इस्टेट, करनाल-132001
दूरभाष: 0184-2201202
दरअसल उसके घर की सीवरेज पाइप कुछ दिन से रूकी हुई थी। आप जानते हैं कि ऐसी स्थिति में व्यक्ति घर में सहज रूप में नहीं रह पाता। यह आप भी मानेंगे कि यदि जमादार न होते, तो हम सचमुच नरक में रह रहे होते। खैर ! दो जमादार जब सीवरेज खोलने के लिए आ गए, तो उसकी सांस में सांस आई। वे दोनों पहले भी इसी काम के लिए आ चुके हैं। एक आदमी थक जाता, तो दूसरा बांस लगाने लगता। कितना मुश्किल काम है ! वह कुछ देर पास खड़ा रहा, फिर दुर्गंध के मारे भीतर चला गया। सोचने लगा कि इनके प्रति सवर्णों का व्यवहार आज भी कहीं-कहीं ही समानताभरा दीखता है। नहीं तो अधिकतर अमानवीय व्यवहार ही होता है। इतिहास तो जातिवादी व्यवस्था का गवाह है ही, आज भी हम सवर्ण इनके प्रति नफरत दिखाकर ही अपने में गर्व अनुभव करते हैं। यह संकीर्णता नहीं तो और क्या है?
उसके मन में ऐसा बहुत कुछ उमड़ रहा था कि बाहर से आवाज आई, ''बाउजी, आकर देख लो!'' वह उत्साह से बाहर गया। पाइप साफ हो चुकी थी।
''बोलो, पानी या फिर चाय!'' उसने पूछा।
''पहले साबुन से हाथ धुला दो !'' वे बोले। शायद वे उसकी उदारता को जानते हैं। वह उनके प्रति अपनी उदारता को याद कर खुश होने लगा। हाथ धुलवाते हुए उसने जान-बूझकर दोनों के हाथों को स्पर्श किया ताकि उन पर उसकी उदारता का सिक्का जमने में कोई कसर न रहा जाए। पैसे तो पूरे देगा ही, पर लगे हाथ एक अवसर मिल गया। बोला, ''एक बार साबुन लगाने से हाथ की बदबू नहीं जाती। रसोई की नाली रूकी थी, तो मैंने कल हाथ से गंद निकाला था। उसके बाद तीन बार हाथ धोए तब जाकर बदबू गई।''
''बाउजी, हमारा तो रोज का यही काम है। थोड़ी चाय पिला दो।''
वह यही सुनना चाहता था। यह तो मामूली बात है। इनके प्रति हमारे पूर्वजों द्वारा किए अन्याय के प्रायश्चित के रूप में हमें बहुत कुछ करना चाहिए। लेकिन क्या ?-यह वह कभी नहीं सोच पाए।
वह रसोई में बड़े उत्साह के साथ चाय बनाने में जुट गया। चाय का सामान डालकर उसने तीन कप निकाले। एक कप बड़ा लिया और दो छोटे, फिर सोचा, 'यह भेदभाव ठीक नहीं। उन्हें चाय की जरूरत मुझसे ज्यादा है।' सोचकर उसने तीनों एक-से कप उठाए। ऐसे और कई कप रखे थे, लेकिन उसने एक कप साबूत लिया और दो ऐसे लिए जिनमें क्रैक पड़े हुए थे।
उधर चाय में उफान आया, तो उसने फौरन आंच धीमी कर दी।
असली खुशी
वह सुबह देरी से उठा। उसके चेहरे पर कल के एक दिवसीय अंतर्राष्ट्र्टीय क्रिकेट में जमाए डेढ़ सौ रनों, बनाए गए मैन ऑफ द मैच और मनाए गए जश्न की खुशी और सुख की नदी बह रही थीं। किंतु असली खुशी की उसे अभी प्रतीक्षा थी।
अधिकतर अखबारों में पहले पृष्ठ पर उसके रंगीन फोटो थे, वह नए मैच-जिताउ खिलाड़ी के रूप में उभारा गया था। उसने चाय की चुस्की के साथ जल्दी-जल्दी अखबारों में अपने फोटो देखे, खबर पढ़ी और अपना कद अखबारों के इंचीटेप से नापा। उसे लगा वह राष्ट्रीय टीम के बड़े खिलाड़ियों के कद के बराबर पहुंचने वाला है। फिर भी, उसे असली खुशी की प्रतीक्षा थी। इसी प्रतीक्षा में शाम हो गई तो उसने अपने सेक्रेटरी से पूछा, ''किसी कंपनी से फोन आया?''
''सारी सर, ऐड के लिए इस बार भी किसी कंपनी ने कांटेक्ट नहीं किया।''
यह सुनकर उसका चेहरा जीरो पर बोल्ड होने वाले खिलाड़ी जैसा हो गया !
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संपर्क: 1882, सेक्टर, 13, अरबन इस्टेट, करनाल-132001
दूरभाष: 0184-2201202

3 टिप्पणियां:
bahut sundar..khaastaur pr Bus driver ki aakhiri trip bahut hi touchy hai...
aaj bahut dino ke baad samayke baad aaj kahaniyaan padi chhoti per sachai ko bayaan karati man ko chhoo to gain per thoda udaas bhi ker gain akhir mein crak wale cupon ne ankhonko geela ker hi diya wah kya baat hai sochane per majboor ker diya
अशोक भाटिया की ये सभी लघुकथाएं सार्थक लेखन के अन्तर्गत आती हैं। लघुकथा को हल्के से लेने वाले लोगों को ऐसी लघुकथाएं अवश्य पढ़नी चाहिएं ताकि उन्हें मालूम हो सके कि लघुकथा में जीवन के विविध विषयों पर सशक्त और सार्थक लेखन भी होता है।
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