
सम्पादकीय
14 सितम्बर हिंदी दिवस। सरकारी और अर्द्ध-सरकारी कार्यालयों में हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ों की धूम मची है। धड़ाधड़ कार्यशालाएं आयोजित हो रही हैं। जैसे श्राद्ध के दिनों में इन दिनों पूजा के लिए ब्राह्मणों की कमी पड़ रही है, हिंदी के ‘प्रकाण्ड’ भी इन पखवाड़ों में कम पड़ रहे हैं। कुछ दिन पहले फोन की घंटी बजी - 'सुरेश जी, हिंदी सप्ताह आ रहा है और देखिए, हिंदी वाले कुछ भी नहीं कर रहे हैं। त्याग के भाव का लोप होता जा रहा है। आप तो बहुत सक्रिय रहते हैं, कोई कार्यक्रम नहीं करा रहे हैं ?' मैं स्मृतियों में खो गया कि पिछले कुछ वर्षों तक यह महानुभाव अंग्रेजी में अपनी विशेष धाक रखते थे लेकिन हिंदी पखवाड़े वाले दिनों में अधिकांश मंचों पर अध्यक्ष और मुख्य अतिथि के रूप में विराजमान रहते थे। मंच भी इनका आभारी रहता था। अचानक मेरे मुँह से निकल पड़ा- 'क्यों, हिंदी को क्या हुआ ?' उनका स्वर तुनकमिजाजी और गिड़गिड़ाहट के सम्मिश्रण से भर उठा - 'मैं तो हिंदी की सेवा करना चाहता था, इसलिए फोन किया।' मैं उनकी पीड़ा समझ गया। हिंदी की सेवा करने की 'प्रबल लाचारी' तो बड़ी व्यापक है, फिर ये महाशय ही इससे वंचित क्यों रहें।
एक ‘हंसोड़ जी’ दरी, टेंट और माइक का व्यवसाय करते थे। उन्होंने देखा कि नुक्कड़ का पनवाड़ी जिस तरह चुटकले सुनाते-सुनाते पान में चूना लगाता है, ऐसे ही चुटकले सुनाने वालों ने हिंदी की सेवा मंचों पर आरंभ की। हंसोड़ जी निर्विरोध शामिल क्या हुए, खासमखास हो गए। और अब हिंदी की ‘अच्छी’ सेवा कर रहे हैं। इनके मुकाबले एक 'अति गंभीर' जी हैं, जो सेवा में इनसे कतई कम नहीं हैं। अपने वज़न के बराबर इनकी किताबें मौजूद हैं। यह अलग बात है कि उनके खुद के और उनके निजी समालोचकों के अलावा उनकी किसी रचना या पंक्ति को कोई याद नहीं रखता। इसी गंभीरता में सारे अर्थ और सारी संवेदनाएं इस कदर दब गई हैं कि उसमें से दस-पंद्रह पुरस्कार निकल पड़ना आम बात है। हिंदी की यह सेवा भी ‘बखूबी’ हो रही है।
मैं कई बार सोचता हूँ कि हिंदी अभी इतनी बीमार नहीं हुई है कि इसे ऐसी सेवाभरी तीमारदारी की इतनी ज़रूरत है। हिंदी की उर्वर धरती पर सहज रूप में पड़े सृजन के बीज स्वयं के बल पर दरख्त भी बनते हैं, जिनकी जड़ें गहराई लिए होती हैं और अपनी ऊँचाई भी। हिंदी की धरती पर ऐसे दरख्त कम चर्चित हैं और उपेक्षित हैं। हिंदी का वास्तविक गौरव यही हैं और ऐसे ही सृजकों के हृदय में हिंदी अपनी सम्पूर्ण आभा और खुशबू के साथ खिलती-बिखरती है तथा भाषा की यही ज़मीनी सुगन्ध हमारे जीवन में रस भरती है और जीवनदायिनी का काम करती है। एक माँ की तरह हिंदी करोड़ों की सेवा का साहस रखती है। उसकी सेवा जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है इस हिंदी का सम्मान।
00
‘सार्थक सृजन’ का यह अगस्त –सितम्बर 2009 का अंक सौंपते हुए हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। सुधी पाठकों और रचनाकारों ने इस अन्तर्जाल पत्रिका का हृदय से स्वागत किया है। मैं उन सभी टिप्पणीकारों का विशेषरूप से आभारी हूँ जिन्होंने समय निकालकर रचनाओं को पढ़ा और अपना बहुमूल्य मत प्रेषित किया। बड़ी संख्या में रचनाकारों ने अपनी रचनाएं भेजकर ‘सार्थक सृजन’ के प्रति जो आस्था व्यक्त की है, मैं उनका भी आभारी हूँ। उन रचनाओं को अभी प्रकाशित नहीं कर पा रहा हूं जिसके पीछे कालगत विवशता है। इन रचनाओं को उनकी रचनाशीलता के अनुसार आगामी अंकों में प्रकाशित कर यह पत्रिका स्वयं को गौरवान्वित महसूस करेगी। आगामी अंकों में महत्वपूर्ण पुस्तकों पर ही चर्चा की जाएगी बशर्ते कि वे पुस्तकें हमारे पास भेजी जाएं। इस अंक में डा. राजेन्द्र गौतम की कविताएं, अशोक वर्मा की गजलें और आकांक्षा यादव की लघु कथाएं प्रकाशित की जा रहीं हैं। आशा है आप इन्हें रूचि के साथ पढ़ेगे और अपनी बेबाक टिप्पणी प्रेषित करेंगे।
सुरेश यादव
संपादक- 'सार्थक सृजन'
14 सितम्बर हिंदी दिवस। सरकारी और अर्द्ध-सरकारी कार्यालयों में हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ों की धूम मची है। धड़ाधड़ कार्यशालाएं आयोजित हो रही हैं। जैसे श्राद्ध के दिनों में इन दिनों पूजा के लिए ब्राह्मणों की कमी पड़ रही है, हिंदी के ‘प्रकाण्ड’ भी इन पखवाड़ों में कम पड़ रहे हैं। कुछ दिन पहले फोन की घंटी बजी - 'सुरेश जी, हिंदी सप्ताह आ रहा है और देखिए, हिंदी वाले कुछ भी नहीं कर रहे हैं। त्याग के भाव का लोप होता जा रहा है। आप तो बहुत सक्रिय रहते हैं, कोई कार्यक्रम नहीं करा रहे हैं ?' मैं स्मृतियों में खो गया कि पिछले कुछ वर्षों तक यह महानुभाव अंग्रेजी में अपनी विशेष धाक रखते थे लेकिन हिंदी पखवाड़े वाले दिनों में अधिकांश मंचों पर अध्यक्ष और मुख्य अतिथि के रूप में विराजमान रहते थे। मंच भी इनका आभारी रहता था। अचानक मेरे मुँह से निकल पड़ा- 'क्यों, हिंदी को क्या हुआ ?' उनका स्वर तुनकमिजाजी और गिड़गिड़ाहट के सम्मिश्रण से भर उठा - 'मैं तो हिंदी की सेवा करना चाहता था, इसलिए फोन किया।' मैं उनकी पीड़ा समझ गया। हिंदी की सेवा करने की 'प्रबल लाचारी' तो बड़ी व्यापक है, फिर ये महाशय ही इससे वंचित क्यों रहें।
एक ‘हंसोड़ जी’ दरी, टेंट और माइक का व्यवसाय करते थे। उन्होंने देखा कि नुक्कड़ का पनवाड़ी जिस तरह चुटकले सुनाते-सुनाते पान में चूना लगाता है, ऐसे ही चुटकले सुनाने वालों ने हिंदी की सेवा मंचों पर आरंभ की। हंसोड़ जी निर्विरोध शामिल क्या हुए, खासमखास हो गए। और अब हिंदी की ‘अच्छी’ सेवा कर रहे हैं। इनके मुकाबले एक 'अति गंभीर' जी हैं, जो सेवा में इनसे कतई कम नहीं हैं। अपने वज़न के बराबर इनकी किताबें मौजूद हैं। यह अलग बात है कि उनके खुद के और उनके निजी समालोचकों के अलावा उनकी किसी रचना या पंक्ति को कोई याद नहीं रखता। इसी गंभीरता में सारे अर्थ और सारी संवेदनाएं इस कदर दब गई हैं कि उसमें से दस-पंद्रह पुरस्कार निकल पड़ना आम बात है। हिंदी की यह सेवा भी ‘बखूबी’ हो रही है।
मैं कई बार सोचता हूँ कि हिंदी अभी इतनी बीमार नहीं हुई है कि इसे ऐसी सेवाभरी तीमारदारी की इतनी ज़रूरत है। हिंदी की उर्वर धरती पर सहज रूप में पड़े सृजन के बीज स्वयं के बल पर दरख्त भी बनते हैं, जिनकी जड़ें गहराई लिए होती हैं और अपनी ऊँचाई भी। हिंदी की धरती पर ऐसे दरख्त कम चर्चित हैं और उपेक्षित हैं। हिंदी का वास्तविक गौरव यही हैं और ऐसे ही सृजकों के हृदय में हिंदी अपनी सम्पूर्ण आभा और खुशबू के साथ खिलती-बिखरती है तथा भाषा की यही ज़मीनी सुगन्ध हमारे जीवन में रस भरती है और जीवनदायिनी का काम करती है। एक माँ की तरह हिंदी करोड़ों की सेवा का साहस रखती है। उसकी सेवा जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है इस हिंदी का सम्मान।
00
‘सार्थक सृजन’ का यह अगस्त –सितम्बर 2009 का अंक सौंपते हुए हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। सुधी पाठकों और रचनाकारों ने इस अन्तर्जाल पत्रिका का हृदय से स्वागत किया है। मैं उन सभी टिप्पणीकारों का विशेषरूप से आभारी हूँ जिन्होंने समय निकालकर रचनाओं को पढ़ा और अपना बहुमूल्य मत प्रेषित किया। बड़ी संख्या में रचनाकारों ने अपनी रचनाएं भेजकर ‘सार्थक सृजन’ के प्रति जो आस्था व्यक्त की है, मैं उनका भी आभारी हूँ। उन रचनाओं को अभी प्रकाशित नहीं कर पा रहा हूं जिसके पीछे कालगत विवशता है। इन रचनाओं को उनकी रचनाशीलता के अनुसार आगामी अंकों में प्रकाशित कर यह पत्रिका स्वयं को गौरवान्वित महसूस करेगी। आगामी अंकों में महत्वपूर्ण पुस्तकों पर ही चर्चा की जाएगी बशर्ते कि वे पुस्तकें हमारे पास भेजी जाएं। इस अंक में डा. राजेन्द्र गौतम की कविताएं, अशोक वर्मा की गजलें और आकांक्षा यादव की लघु कथाएं प्रकाशित की जा रहीं हैं। आशा है आप इन्हें रूचि के साथ पढ़ेगे और अपनी बेबाक टिप्पणी प्रेषित करेंगे।
सुरेश यादव
संपादक- 'सार्थक सृजन'

5 टिप्पणियां:
हिंदी दिवस पर आपका संपादकीय ध्यान खींचता है। संकेत भरे व्यंग्य से आप ने जो कहने की कोशिश की है उसका आशय किसी से छुपा नहीं है। हिंदी के नाम पर यही सब हो रहा है। हिंदी की जो वास्तव में सेवा कर रहे हैं, वे उपेक्षा का शिकार हैं। 'सार्थक सृजन'आने वाले समय में ब्लॉग की दुनिया में अपनी सार्थकता के लिए पहचाना जाएगा।
हिन्दी-पखवाडे को लेकर सरकारी कार्यालयों में जो रस्म अदायगी की जाती हे-वह किसी से छिपी नहीं हॆ.यह भी एक 15 दिन चलने वाला सरकारी त्यॊहार हॆ-हिन्दी पखवाडे का बॆनर,कुछ हिदीं में पत्राचार,कुछ टिप्पणियां,भाषण व निबंध-प्रतियोगिता
फिर पुरस्कार ऒर उसके बाद उच्चाधिकारियों को पखवाडे की रिपोर्ट-बस! हो गयी हिन्दी की सेवा.अगले ही दिन से,फिर अग्रेजी का गुण-गान शुरू.इशारों में, अपने सम्पादकीय में, आपने भी बहुत कुछ कह दिया हॆ.
एक सार्थक संपादकीय। हिंदी के सार्थकता को गहरे अर्थ देता। साफगोई से इतना सब कुछ कहना, क्या हिंदी की सेवा करने के नाम पर मेवा बटोरने वाले कानों पर इसका असर होगा। मुझे नहीं लगता। वे तो अभ्यस्त हो चुके हैं पर इस चुप्पी को तोड़ने का बेलौस प्रयास।
suresh ji
namaskar
ek saarthak sampadkiy .. hamare hi desh me hindi jiski raajbhasha hai , wahan par log hindi par shodhkaary karne videsh jaate hai !!!!!, ye sirf isi desh me ho sakta hai .. aapne bahut accha likha ...
meri badhai sweekar kare.
kya meri kavitayen bhi yahan prakashit ho sakti hai ..
regards
vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com
Suresh ji,
Naye ank ka intzar..........!!!!
एक टिप्पणी भेजें