डॉ. राजेन्द्र गौतम हिंदी काव्य, गीत-नवगीत और आलोचना के क्षेत्र में एक सुपरिचित एवं प्रतिष्ठित नाम
हैं। भाव, संवेदना और विचार की सघन अनुभूति इनकी रचनाओं में स्पष्टत: देखी जाती है। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाओं का प्रकाशन निरंतर होता रहा है और हिंदी का पाठक इनसे अपरिचित नहीं है। डॉ. गौतम कृत 'गीत पर्व आया है' तथा 'पंख होते हैं समय के' प्रसिद्ध गीत और नवगीत रचनाओं के उत्कृष्ठ संग्रह हैं। 'बरगद जलते हैं' संग्रह में इस गति को बहुत ऊँचाई दी है। डॉ गौतम की ज़मीन से जुड़ी सहज संवेदना की पाँच सशक्त काव्य-रचनाएँ यहाँ प्रस्तुत हैं।
सम्पादक - सार्थक सृजन
डा. राजेन्द्र गौतम की पांच कविताएं
1.
अम्मां का संसार
चला कहीं-
जाये नहीं
मेहमानों का ध्यान
धीरे-धीरे माँ हुई
कोने का सामान।
बड़का-
दिल्ली जा बसा
मँझला दूजे देश
दीपक धर माँ थान पर
माँगे कुशल हमेश।
व्यर्थ सभी संचार हैं
तार और बेतार
खटिया तक
महदूद है
अम्मा का संसार।
रखी ताक में
ताकती
बप्पा की तस्वीर
छिपा गयी हँस फेर मुख
माँ नयनों का नीर।
अनबोला
कब तक चले
सास-बहू के बीच
तुतले बोलों ने
दिया सारा रोष उलीच।
2.
शीतलहर है
रात अभी यह
तीन पहर है।
बर्फ हुई
गर्मी धूनी की
'पौ-फटनी'
है दूर
गुड़ीमुड़ी काया
रल्दू की
ठिठुरन को मजबूर
रोम-रोम में
शीतलहर है।
मुखिया
खिला-खिला
रहता है
क्या-क्या खबरें बाँच
तब रल्दू के सपनों में भी
कौंधा करती आँच
अब सपनों में
घुला जहर है।
औसारे में
सबद-रमैनी-आल्हा
गुमसुम हैं
बुझे हुए चूल्हों में
पिल्ले दुबकाए
दुम हैं
पाला ढाता
गजब कहर है।
3.
उसी गाँव की देह
हम गँवार
लगते तुम्हें
बिल्कुल उल-जलूल
ज्यों संस्कृत कालीन पर
चमरौधे की धूल।
भूख
गाँव में भटकती
तन पर
फटी कमीज
सभ्य नगर की आँख में
चुभती यही तमीज।
सात समन्दर पार तक
खिंचता
जिसका रक्त
उसी गाँव की
देह ये
मिलजुल करें विभक्त।
जंगल के
सब भेड़िये
बसे गाँव में आन
राम हवाले ही समझ
अब भेड़ों के प्राण ।
राजपथों पर
भटकता
संग लिए जो गाँव
उसके सपनों की नहीं
कम बरगद से छांव।
रंगमहल में
उतरती
तारों की बारात
खाँस-खाँस कर
काटतीं
झोपड़ियाँ जब रात।
4.
बरगद जलते हैं
इस जंगल में
आग लगी है
बरगद जलते हैं।
भुने कबूतर
शाखों से हैं
टप-टप चू पड़ते
हवन-कुंड में
लपट उठे ज्यों
यों समिधा बनते
अंडे बच्चे
नहीं बचेंगे
नीड़ सुलगते हैं।
पिघला लावा
भर लायी
यह जाती हुई सदी
हिरनों की
आँखों में बहती
भय की एक नदी
झीलों-तालों से
तेजाबी
बादल उठते हैं।
उजले कल की
छाया ठिठकी
काले ठूठों पर
नरक बना
घुटती चीखों से
यह कलरव का घर
दूब झुलसती
रेत उबलती
खेत पिघलते हैं।
5.
वृद्धा पुराण
‘मझले की
चिट्ठी आयी है
ओ मितरी की माँ।
परदेशों में जाकर भी
वह मुझको कब भूला
पर बच्चों की
नहीं छुट्टियां
आना मुश्किल है
वह तो मुझे बुला ही लेता
अपने क्वाटर पर
अरी सोच
कब लगता मेरा
दिल्ली में दिल है
भेजेगा
मेरी खाँसी की
जल्दी यहीं दवा।’
‘मेरे बड़के का भी
खत री
परसों ही आया
तू ही कह
किसके होते हैं
इतने अच्छे लाल
उसे शहर में
मोटर-बँगला
सारे ठाठ मिले
गाँव नहीं पर अब तक भूला
आयेगा इस साल
टूटा छप्पर करवा देगा
अब की बार नया।'
‘एक बात
पर मितरी की माँ
समझ नहीं आती
क्यों सब-
बड़के-छुटके, मझले
पहुँचे देस-विदेस
लठिया-खटिया
राख-चिलमची
अपने नाम लिखे
चिट्ठी-पतरी-तार
घूमते
ले घर-घर संदेश
यहाँ मोतियाबिंद बचा
या गठिया और दमा।'
00
सम्पर्क : बी-226, राजनगर,
पालम, नई दिल्ली-110045
दूरभाष : 25362321(निवास)
9868140469(मोबाइल)
ई मेल : rajendragautam99@yahoo.com
हैं। भाव, संवेदना और विचार की सघन अनुभूति इनकी रचनाओं में स्पष्टत: देखी जाती है। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाओं का प्रकाशन निरंतर होता रहा है और हिंदी का पाठक इनसे अपरिचित नहीं है। डॉ. गौतम कृत 'गीत पर्व आया है' तथा 'पंख होते हैं समय के' प्रसिद्ध गीत और नवगीत रचनाओं के उत्कृष्ठ संग्रह हैं। 'बरगद जलते हैं' संग्रह में इस गति को बहुत ऊँचाई दी है। डॉ गौतम की ज़मीन से जुड़ी सहज संवेदना की पाँच सशक्त काव्य-रचनाएँ यहाँ प्रस्तुत हैं।सम्पादक - सार्थक सृजन
डा. राजेन्द्र गौतम की पांच कविताएं
1.
अम्मां का संसार
चला कहीं-
जाये नहीं
मेहमानों का ध्यान
धीरे-धीरे माँ हुई
कोने का सामान।
बड़का-
दिल्ली जा बसा
मँझला दूजे देश
दीपक धर माँ थान पर
माँगे कुशल हमेश।
व्यर्थ सभी संचार हैं
तार और बेतार
खटिया तक
महदूद है
अम्मा का संसार।
रखी ताक में
ताकती
बप्पा की तस्वीर
छिपा गयी हँस फेर मुख
माँ नयनों का नीर।
अनबोला
कब तक चले
सास-बहू के बीच
तुतले बोलों ने
दिया सारा रोष उलीच।
2.
शीतलहर है
रात अभी यह
तीन पहर है।
बर्फ हुई
गर्मी धूनी की
'पौ-फटनी'
है दूर
गुड़ीमुड़ी काया
रल्दू की
ठिठुरन को मजबूर
रोम-रोम में
शीतलहर है।
मुखिया
खिला-खिला
रहता है
क्या-क्या खबरें बाँच
तब रल्दू के सपनों में भी
कौंधा करती आँच
अब सपनों में
घुला जहर है।
औसारे में
सबद-रमैनी-आल्हा
गुमसुम हैं
बुझे हुए चूल्हों में
पिल्ले दुबकाए
दुम हैं
पाला ढाता
गजब कहर है।
3.
उसी गाँव की देह
हम गँवार
लगते तुम्हें
बिल्कुल उल-जलूल
ज्यों संस्कृत कालीन पर
चमरौधे की धूल।
भूख
गाँव में भटकती
तन पर
फटी कमीज
सभ्य नगर की आँख में
चुभती यही तमीज।
सात समन्दर पार तक
खिंचता
जिसका रक्त
उसी गाँव की
देह ये
मिलजुल करें विभक्त।
जंगल के
सब भेड़िये
बसे गाँव में आन
राम हवाले ही समझ
अब भेड़ों के प्राण ।
राजपथों पर
भटकता
संग लिए जो गाँव
उसके सपनों की नहीं
कम बरगद से छांव।
रंगमहल में
उतरती
तारों की बारात
खाँस-खाँस कर
काटतीं
झोपड़ियाँ जब रात।
4.
बरगद जलते हैं
इस जंगल में
आग लगी है
बरगद जलते हैं।
भुने कबूतर
शाखों से हैं
टप-टप चू पड़ते
हवन-कुंड में
लपट उठे ज्यों
यों समिधा बनते
अंडे बच्चे
नहीं बचेंगे
नीड़ सुलगते हैं।
पिघला लावा
भर लायी
यह जाती हुई सदी
हिरनों की
आँखों में बहती
भय की एक नदी
झीलों-तालों से
तेजाबी
बादल उठते हैं।
उजले कल की
छाया ठिठकी
काले ठूठों पर
नरक बना
घुटती चीखों से
यह कलरव का घर
दूब झुलसती
रेत उबलती
खेत पिघलते हैं।
5.
वृद्धा पुराण
‘मझले की
चिट्ठी आयी है
ओ मितरी की माँ।
परदेशों में जाकर भी
वह मुझको कब भूला
पर बच्चों की
नहीं छुट्टियां
आना मुश्किल है
वह तो मुझे बुला ही लेता
अपने क्वाटर पर
अरी सोच
कब लगता मेरा
दिल्ली में दिल है
भेजेगा
मेरी खाँसी की
जल्दी यहीं दवा।’
‘मेरे बड़के का भी
खत री
परसों ही आया
तू ही कह
किसके होते हैं
इतने अच्छे लाल
उसे शहर में
मोटर-बँगला
सारे ठाठ मिले
गाँव नहीं पर अब तक भूला
आयेगा इस साल
टूटा छप्पर करवा देगा
अब की बार नया।'
‘एक बात
पर मितरी की माँ
समझ नहीं आती
क्यों सब-
बड़के-छुटके, मझले
पहुँचे देस-विदेस
लठिया-खटिया
राख-चिलमची
अपने नाम लिखे
चिट्ठी-पतरी-तार
घूमते
ले घर-घर संदेश
यहाँ मोतियाबिंद बचा
या गठिया और दमा।'
00
सम्पर्क : बी-226, राजनगर,
पालम, नई दिल्ली-110045
दूरभाष : 25362321(निवास)
9868140469(मोबाइल)
ई मेल : rajendragautam99@yahoo.com


6 टिप्पणियां:
राजेन्द्र गौतम जी के ये दोहे और गीत जितनी बार भी सुने-पढ़े, दिल में उतरते चले गए। गहन मानवीय संवेदनाओं से भरी ये काव्य रचनाओं का चयन 'सार्थक सृजन' को सार्थक करता है।
raajendr gautam jee ke paancho geet pade jo man ko chhute chale gaye mei subhash jee se sehmat hoon ki ye gahan manviya samvednaaon se bharii hui rachnaen hein -
yhaan motiyabind bachaa
ya gathiya aur damaa.
inn behtariin rachnaon ke liye aap tathaa goutam jee meri aur se badhai sveekaren
ashok andrey
Dr. Rajendra Gautam ki rachanaon ka main murid hun. Bahut sundar geet hain.
Badhai.
Chandel
सभी एक से बढ़कर एक..खासकर:
"बड़का-
दिल्ली जा बसा
मँझला दूजे देश
दीपक धर माँ थान पर
माँगे कुशल हमेश।"
एक से एक बढ़कर
एक पर सदैव नेक
गहरे अनुभवों का
विस्तार लिए हुए
।
Rachnayen padhte,padhte aankhen nam ho gayee...aisee kitnee ammayen hongee is desh me...kya fayda aisee 'uchh shiksha' kaa jo apnon se, apne desh se door kar de?
Harek rachna marmik aur gahree hai!
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