
अशोक वर्मा ने लघुकथाओं, कहानियों की रचना की और उपन्यास की भी। परन्तु ग़ज़ल में इन्होंने ऐसा
महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किया है जो अशोक वर्मा को स्पष्ट पहचान देता है। 'मैं अभी मौजूद हूँ' तथा 'ग़ज़ल बोलती है' दो ऐसे ही महत्वपूर्ण ग़ज़ल संग्रह हैं जो इस पहचान को और गहराई से रेखांकित करते हैं। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी अशोक वर्मा ने बाल साहित्य, निबंध भी सृजित किए और महत्वपूर्ण संपादन-कार्य भी किया। 'सार्थक सृजन' में इस बार इनकी पाँच ग़ज़लें प्रस्तुत हैं ।
सम्पादक - सार्थक सृजन
अशोक वर्मा की पाँच ग़ज़लें
1.
आग, पानी, फूल, पत्ते और हवा रख जाऊँगा
इस चमन में खुशबुओं का मैं पता रख जाऊँगा
रात में ठोकर मुसाफिर को लगे ना इसलिए
मैं गली के मोड़ पर जलता दिया रख जाऊँगा
आनेवाली नस्ल शर्मिन्दा कभी होगी नहीं
जिन्दगी जीने का मैं वो फलसफा रख जाऊँगा
इस अपाहिज वक्त पर तुम मत हँसो अय पत्थरों
शक्ल जो बदलेगा इसकी आईना रख जाऊँगा
बाद मेरे जान लेंगे लोग सब मेरा हुनर
कुछ लिखा पन्नों पे और कुछ अनलिखा रख जाऊँगा
2.
बरसों से दूर-दूर तक शोहरत हवा की है
जो चल रहे हैं धूप में राहत हवा की है
गुजरी वो मेरे जिस्म से ये ढलने की जिद करे
आँचल के हाथ देख तू इज्जत हवा की है
इस अजनबी से शहर में लगता है आज भी
बिस्तर हवा का है तो कभी छत हवा की है
दिन-रात इस अलाव को ईंधन दिया है यार
ईंट जो अधपकी हैं ये हरकत हवा की है।
3.
समन्दर आज तू कैसा उफान कर बैठा
हमारे पाँव के गायब निशान कर बैठा
चला जो जीतने दुनिया की सारी खुशियों को
यहाँ नीलाम क्यों अपना मकान कर बैठा
यहां के लोग इस उलझन में हैं कि दीवाना
निभा भी पाएगा कैसी जुबान कर बैठा
उसे उस पार की जन्नत नसीब होगी ही
इसी उम्मीद पर खुद को ही दान कर बैठा
गलतफहमी का साया क्या पड़ा कि अपनों में
वो मीलों फासले ही दरम्यान कर बैठा।
4.
हादसों की आग लेकर किसलिए
फूँक डाला है ये मंजर किसलिए
फूल नोंचे, बेच डालीं खुशबुएँ
ये नशा हावी है तुम पर किसलिए
खूबसूरत है ये शीशे का मकाँ
हाथ में लेते हो पत्थर किसलिए
है वतन सोने की चिड़िया दोस्तो
कर रहे हो इसको बेपर किसलिए
तीर-ओ-तरकश हैं अमन के वास्ते
उठ रहा अपनों पे खंजर किसलिए।
5.
खण्डित-सा हो बैठा सूरज आकर इसको जोड़े कौन
परछाईं की चादर छोटी अपने पाँव सिकोड़े कौन
खामोशी के चंगुल में अब घिरता जाता है आँगन
शब्दों का अर्जुन भी चुप है सन्नाटे को तोड़े कौन
मैं तो इक माटी का दीपक चौराहे पर रखता हूँ
आखिर आँगन-आँगन जाकर तम को रोज निचोड़े कौन
चीरहरण के किस्से पर भी शमशीरें क्यों मौन रहीं
फिर शकुनि की कपटी चालें, उसके सिर को फोड़े कौन
माखन-मिसरी की चोरी में कृष्ण समय का उलझा है
जीवन के संग्राम में आकर रथ के घोड़े मोड़े कौन।
00
सम्पर्क : 110, लाजवन्ती गार्डन
नई दिल्ली-110046
दूरभाष : 28522716(निवास)
9250909592(मोबाइल)
सम्पादक - सार्थक सृजन
अशोक वर्मा की पाँच ग़ज़लें
1.
आग, पानी, फूल, पत्ते और हवा रख जाऊँगा
इस चमन में खुशबुओं का मैं पता रख जाऊँगा
रात में ठोकर मुसाफिर को लगे ना इसलिए
मैं गली के मोड़ पर जलता दिया रख जाऊँगा
आनेवाली नस्ल शर्मिन्दा कभी होगी नहीं
जिन्दगी जीने का मैं वो फलसफा रख जाऊँगा
इस अपाहिज वक्त पर तुम मत हँसो अय पत्थरों
शक्ल जो बदलेगा इसकी आईना रख जाऊँगा
बाद मेरे जान लेंगे लोग सब मेरा हुनर
कुछ लिखा पन्नों पे और कुछ अनलिखा रख जाऊँगा
2.
बरसों से दूर-दूर तक शोहरत हवा की है
जो चल रहे हैं धूप में राहत हवा की है
गुजरी वो मेरे जिस्म से ये ढलने की जिद करे
आँचल के हाथ देख तू इज्जत हवा की है
इस अजनबी से शहर में लगता है आज भी
बिस्तर हवा का है तो कभी छत हवा की है
दिन-रात इस अलाव को ईंधन दिया है यार
ईंट जो अधपकी हैं ये हरकत हवा की है।
3.
समन्दर आज तू कैसा उफान कर बैठा
हमारे पाँव के गायब निशान कर बैठा
चला जो जीतने दुनिया की सारी खुशियों को
यहाँ नीलाम क्यों अपना मकान कर बैठा
यहां के लोग इस उलझन में हैं कि दीवाना
निभा भी पाएगा कैसी जुबान कर बैठा
उसे उस पार की जन्नत नसीब होगी ही
इसी उम्मीद पर खुद को ही दान कर बैठा
गलतफहमी का साया क्या पड़ा कि अपनों में
वो मीलों फासले ही दरम्यान कर बैठा।
4.
हादसों की आग लेकर किसलिए
फूँक डाला है ये मंजर किसलिए
फूल नोंचे, बेच डालीं खुशबुएँ
ये नशा हावी है तुम पर किसलिए
खूबसूरत है ये शीशे का मकाँ
हाथ में लेते हो पत्थर किसलिए
है वतन सोने की चिड़िया दोस्तो
कर रहे हो इसको बेपर किसलिए
तीर-ओ-तरकश हैं अमन के वास्ते
उठ रहा अपनों पे खंजर किसलिए।
5.
खण्डित-सा हो बैठा सूरज आकर इसको जोड़े कौन
परछाईं की चादर छोटी अपने पाँव सिकोड़े कौन
खामोशी के चंगुल में अब घिरता जाता है आँगन
शब्दों का अर्जुन भी चुप है सन्नाटे को तोड़े कौन
मैं तो इक माटी का दीपक चौराहे पर रखता हूँ
आखिर आँगन-आँगन जाकर तम को रोज निचोड़े कौन
चीरहरण के किस्से पर भी शमशीरें क्यों मौन रहीं
फिर शकुनि की कपटी चालें, उसके सिर को फोड़े कौन
माखन-मिसरी की चोरी में कृष्ण समय का उलझा है
जीवन के संग्राम में आकर रथ के घोड़े मोड़े कौन।
00
सम्पर्क : 110, लाजवन्ती गार्डन
नई दिल्ली-110046
दूरभाष : 28522716(निवास)
9250909592(मोबाइल)

6 टिप्पणियां:
अशोक वर्मा की ग़ज़लें उम्दा है और इनके कई शे'र बहुत प्रभावकारी हैं।
ashok verma jee ki achchhi gaklon ke liye badhai sveekaren
ashok andrey
रात में ठोकर मुसाफिर को लगे ना इसलिए
मैं गली के मोड़ पर जलता दिया रख जाऊँगा।
यह हुआ न सार्थक काव्य ऽशोक जी को हार्दिक साधुवाद्।
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
Ashok Verma ek sthapit vaishtha Gazhalkar hain. Sabhi Gazhalen antartam ko bhigo gayin.
Prakashit karane ke lie dhanyavad.
Chandel
एक से बढ़कर एक नहीं
एक से बढ़कर पांच
नहीं सांच को आंच
बांच सके तो दिल से बांच।
ghazal hain ya ek naye vishva ka srrijan ? bahut sundar bhav aur bahav se bhari hain rachanayein..
एक टिप्पणी भेजें