गुरुवार, 26 नवंबर 2009

गजलें




श्री उपेन्द्र कुमार समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में एक जाना-पहचाना नाम है। इनकी इन्जीनियरिंग शिक्षा ने कविता और ग़ज़ल को मौलिकता प्रदान की है। इनके अब तक दो कविता संग्रह – ‘उदास पानी’ और ‘गांधारी पूछती है’ प्रकाशित हुए हैं। इन कविताओं को पर्याप्त सराहना मिली है परन्तु ग़ज़ल ने उपेन्द्र कुमार को पहचान दी है। ‘अपना घर नहीं आया’ और ‘खुशबू उधार ले आए’ इनके ग़ज़ल संग्रह बेहद चर्चित रहे हैं। रोमानी भावबोध और जीवन की विसंगतियों को बिना किसी आग्रह-दुराग्रह के अपनी रचनाओं में तराशा है। हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा ‘साहित्यकार सम्मान’ नवाजे जा चुके हैं और वर्तमान में, भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय में प्रधान निदेशक के पद से सेवानिवृत्त होकर साहित्य-साधनारत हैं।
सम्पादक – ‘सार्थक सृजन’



उपेन्द्र कुमार की पांच गजलें

एक
ये जो दर्द है अपने सीने में, ये नया भी है, ये अजीब भी
कि उगा है दिल की जमीन से ये दिमाग से है करीब भी
जो कदम हमारे ये तेज हैं ये उसी उम्मीद का फैज है
जो दिखाए मौत की घाटियाँ जो बनी है अपनी सलीब भी
यूँ जले नगर कि शवों को भी वो कफन न कोई दे सका
कि पहुँच के चाँद में आदमी, रहा किस कदर गरीब भी
मेरी पूँजी तमाम दर्द थी उसे किस तरह कोई जानता
ये जो दर्द होता जमीन-सा कोई माप लेती जरीब भी
कोई और वादे कीजिए कि समय का दु:ख तो दराज है
न ये वक्त ही टलने की चीज है, न बदल सकेगा नसीब भी।

दो
वादे थे फिर वादे ही वो टूट गए तो क्या कीजे
साथी थे फिर साथी ही वो छूट गए तो क्या कीजे
तन-मन से प्यारे थे सपने चाह ने जो दिखलाए
सोच की आँखें खुल जाने पर टूट गए तो क्या कीजे
प्यार के वो अनमोल खजाने आस रही तो अपने थे
उन्हें निराशा के अँधियारे लूट गए तो क्या कीजे
जीवन नैया के जो चप्पू हमने मिलकर थामे थे
अनहोनी के तेज भँवर मे टूट गए तो क्या कीजे
खुशहाली ने जिनकी खुशी में घर संसार सजाया था
बुरे वक्त में मीत वही जो रूठ गए तो क्या कीजे
आस हवा का दामन निकली हम बेचारे क्या करते
इंतजार में भाग हमारे फूट गए तो क्या कीजे
दर्द के रिश्ते इनसानों में जब तक थे मजबूत रहे
प्यार के धागे कोमल थे जो टूट गए तो क्या कीजे

तीन
चारों तरफ लहू का समंदर न देखिए
हिंसा ने कर दिया है जो मंजर न देखिए
बाहर की ये चमक ये दमक और कुछ नहीं
ये तो लिखा हुआ है कि अंदर न देखिए
खुद को संभालना कोई मुश्किल नहीं यहाँ
चल ही दिए हैं आप तो मुड़कर न देखिए
जख्मों पे फिर नमक ही छिड़कना है क्या जरूर
मिल कर बिछड़ रहे हैं तो हँसकर न देखिए
संभव नहीं है आपका रहना अगर यहाँ
लालच भरी नजर से मेरा घर न देखिए
टकरा गई नजर तो सँभल ही न पाओगे
इस शहर में दरीचों के अन्दर न देखिए

चार
रहता हूँ, मगर शहर में आबाद नहीं हूँ
बेचैन हूँ, बेहाल हूँ, बर्बाद नहीं हूँ
जंजीर कहीं कोई दिखाई नहीं देती
उड़ने के लिए फिर भी मैं आजाद नहीं हूँ
नाकरदा गुनाहों की सजा भोग रहा हूँ
भगवान जिसे सुन ले वो फरियाद नहीं हूँ
मंजिल के पास आके ही भटका हूँ हमेशा
कहते हैं लोग फिर भी मैं नाशाद नहीं हूँ
उसकी ही मुहब्बत में कटी उम्र, पर अफसोस
चाहा है जिसे जी से उसे याद नहीं हूँ।

पांच
शर्तें समय के दाँव लगाये हुए हैं लोग
क्या-क्या न जिन्दगी को बनाए हुए हैं लोग
खुद को ही खुद से खूब छुपाये हुए हैं लोग
सूरज पे मगर दोष लगाये हुए हैं लोग
अब आईना छुपाइये, चेहरा बचाइये
पत्थर हरेक ओर उठाए हुए हैं लोग
कानून जा छुपा किसी कातिल के शिविर में
इन्साफ की गुहार मचाये हुए हैं लोग
चलिए तिमिर के पार के मंजर भी देख लें
उम्मीद की मशाल जलाये हुए हैं लोग
चुप्पी तो उनकी सिर्फ छलावा है वक्त का
दिल में हजार गम भी छिपाए हुए हैं लोग।
00
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मोबाईल- 09818934640

4 टिप्‍पणियां:

PRAN SHARMA ने कहा…

SHRI UPENDRA KUMAR KEE GAZALEN
BADE SHAUQ SE PADH GAYAA HOON.
GAZAL MEIN SHABD KE SAHEE WAZAN
PAR BAHUT ZIADAA DHYAAN DIYAA JATA
HAI.SHRI UPENDRA KUMAR KE EKAADH
MISRA SHABD KE GALAT WAZAN KE KARAN
KHAARIZ HO GYAA HAI.JAESE--
KAHTE HAIN LOG PHIR BHEE
MAIN NAASHAAD NAHIN HOON.
" LOG" SHABD GALAT WAZAN
MEIN PRAYUKT HUAA HAI." SABHEE"
WAZAN KAA KOEE SHABD PRAYUKT HOTA
TO MISRAA SAHEE HOTA --

KAHTE HAIN SABHEE PHIR BHEE
MAIN NAASHAAD NAHIN HOON
EK-DO ANYA MISRON MEIN
" PAAS" AUR " SHIVIR" SHABDON KO
BHEE UNKE SAHEE WAZAN MEIN PRAYUKT
NAHIN KIYAA GYAA HAI.

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

सुरेश

उपेन्द्र जी ग़जलें बहुत सुन्दर हैं. इन पंक्तियों ने उद्वेलित कर दिया .

चारों तरफ लहू का समंदर न देखिए
हिंसा ने कर दिया है जो मंजर न देखिए

बधाई

चन्देल

सुभाष नीरव ने कहा…

उपेन्द्र जी की ग़ज़लें प्रभावित करती हैं। कई शे'र याद रखने वाले हैं।

ashok andrey ने कहा…

upendr jee ko to pehle bhee sunaa tathaa padaa hai unkee gajle gehraa prabhaav chhodtee hain in achchhi gajlon ke liye mai unhen badhai detaa hoon
ashok andrey