सत्य नारायण हिंदी साहित्य जगत में एक ऐसा जाना-माना नाम है जिन्होंने जनता से अपनी रचनाओं के माध्यम से हमेशा ही सीधा सम्वाद किया है। अपने गीतों, नवगीतों, कविताओं को लेकर इनके अनेक संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें ‘सभाध्यक्ष हँस रहा है’ और ‘टूटते जलबिंब’ बहुत ही प्रसिद्ध नवगीत संग्रह हैं। इनकी नुक्कड़ कविता और गीत कविता के सम्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका है। ‘बिहार राष्ट्र्भाषा परिषद’ के विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान एवं गोपाल सिंह नेपाली पुरस्कार से सम्मानित।बच्चों पर केन्द्रित चार कविताएँ
-सत्य नारायण
बच्चे-1
बच्चे
जैसे कथा-कहानी !
परी-देस के
स्वप्न सरीखे
दीखे, खुल-खिल
हंसते दीखे
ऊपर झिलमिल
चांद -सितारे
नीचे कल-कल
बहता पानी !
इनकी तुतली-
तुतली भाषा
मेवा-मिसरी
दूध-बतासा
कांच रबड़ के
खेल-खिलौने
गुड्डे-गुड़िया
राजा-रानी !
छंद गीत के
बहर गजल की
आहट
आने वाले कल की
सोच-समझ
से भी बढ़कर है
इन मासूमो
की कहानी !
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बच्चे-2
बच्चे
अक्सर चुप रहते हैं!
कौन चुराकर
ले जाता है
इनके होंठों की फुलझड़ियां
बिखरी-बिखरी-सी
लगतीं क्यों
मानिक-मोती की ये लड़ियां
इनकी डरी-डरी-आंखों में
किन दहशत के
नाम-पते हैं ?
जाने कहां
गवां आए ये
चपल चौकड़ी सोन हिरन की
घर-आंगन से
रूठ गई क्यों
नन्हीं थिरकन प्रात किरन की
गुमसुम-गुमसुम-से
रहकर भी, हमसे
बहुत-बहुत कहते हैं!
ये तह-दर-तह
खुल जाएंगे
पास-बिठाकर इनमें झांकें
इस संवेदनहीन समय में
इन पर
कोई कलरव टांकें
तनिक चूमकर देखें
कैसे सात सुरों में
ये बजते है!
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बच्चे-3
नींद में भी
जागते हैं.
सो रहे बच्चे !
बिस्तरे पर ही
लौने को
समेटे ये
पास रखकर
देखिए
निश्चिंत लेटे ये
सो रहे
सपने सुनहरे
बो रहे बच्चे !
मुस्कराते
चिंहुकते हैं
होंठ हिलते हैं
नींद की
अमराइयों में
फूल खिलते हैं
कोंपलें, कलियां
तितलियां
हो रहे बच्चे!
आज
मीठी लोरियां
है नेह आँचल का
यह समय
पत्थर समय है
क्या पता कल का
नींद में भी
एक दहशत
ढो रहे बच्चे !
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बच्चा और दंगा
बच्चा नहीं जानता
शहर में दंगा क्यों हुआ
कर्फ्यू क्या होता है
तमाम दुकानों बंद क्यों हैं
लोग-बाग अपनें घरों से
निकलते क्यों नहीं
बच्चा नहीं जानता!
वह नहीं जानता
आज अखबार की सुर्खियों
में क्या है
किसने क्या बयान दिये
शोभा-यात्रा या ताजिये पर
पत्थर किसने फेंके
इधर या उधर कितने मारे गए
बच्चा नहीं जानता!
बच्चा
बस, इतना जानता है
कि अब
उसका सलीम स्कूल नहीं आता
खोंमचेवाला किशना लापता है
रामसरन और रहमत की गुमटियां
अब पास-पास नहीं हैं
पापा को देखते ही
रहीम चाचा आंखें फेर लेते हैं
मां अब पीर बाबा के मजार पर नहीं जाती
उसके लिए गंडे
और ताबीज नहीं लाती
बच्चा
बस, इतना जानता है!
वह नहीं जानता
कि शहर में एकाएक
ये अनदेखी दीवारें कैसे खड़ी हो गई
कल तक हंसते-बतियाते लोग
एकदम अजनबी कैसे हो गए
एक हादसा
एक जुनुन
हमारे रिश्ते कैसे बदल देता है
बच्चा नहीं जानता
इसे हम जानते हैं
हम!
और हम चुप रहते हैं!
हां
वह दिन भी आएगा
जब यह बच्चा इसी तरह चुप रहेगा
अपने बच्चे के सामने
और तब....?
और तब....?
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सम्पर्क :
डी ब्लॉक, बी पी सिन्हा पथ,
कदमकुआँ, पटना-800003
फोन : 093343 10250

12 टिप्पणियां:
सत्यनारायणजी की चारों कविताएँ बेजोड़ हैं। बच्चों को केन्द्र में रखकर लिखने के लिए अन्यन्त संवेदनशील मानस की दरकार होती है जिसे उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि उनके पास है। इतनी सुन्दर कविताओं के चुनाव के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
bachchon ki achchhi rachnaen jab padne ko milti hein to mun khush ho jaata hei inn sundar baal rachnaon ke liye mei badhai deta hoon Satnarayan jee ko
priya bhai satyanarayan ji ke charo balgeet excellent hain.unhe meri badhai.unse yah bhi anurodh ki ve aur bhi baalgeet likhen, kyonki unake pas bachchon ko dekhne-parakhane ki drishti bhi hai,samvedana bhi aur samarthya bhi.
buddhinath mishra/9412992244
बहुत सुन्दर कवितायें !
सादर
इला
सशक्त रचनाएँ...बधाई.
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शब्द सृजन की ओर पर आतंकवाद की चर्चा
1
छंद गीत के
बहर गजल की
आहट
आने वाले कल की
2 बच्चे अक्सर चुप रहते हैं!
कौन चुराकर
ले जाता है
इनके होंठों की फुलझड़ियां
shri satya narayan jee , sadhuwad ki aap ne bachpan ko char alag a;ag roop me samna ralha .vishay varman haalat ke hai , charo me ek saarsi lagti hai kavitae. man ko chhune wali hai bhawanae.baccho ka bacpan, punah satya narayan jee ko aabhar
bahut badhi sureshji satynarainji hamare agraj kavi aur suparichit kavi hain
सत्य नारायण जी की बच्चों पर केन्द्रित चार कविताएँ बहुत भाव-प्रवण हैं। इन कविताओं की गहराई हर शब्द में महसूस की जा सकती है ।
बच्चों पर केन्द्रित अच्छी रचनाएँ हैं। दूसरी रचना की अपील करती पंक्तियाँ .........
'तनिक चूमकर देखें
कैसे सात सुरों में
ये बजते है!'
.......और आखिरी रचना की यथार्थ को झकझोरती पंक्तियाँ ......
'बच्चा
बस, इतना जानता है
कि अब
उसका सलीम स्कूल नहीं आता
खोंमचेवाला किशना लापता है
रामसरन और रहमत की गुमटियां
अब पास-पास नहीं हैं
पापा को देखते ही
रहीम चाचा आंखें फेर लेते हैं
मां अब पीर बाबा के मजार पर नहीं जाती
उसके लिए गंडे
और ताबीज नहीं लाती'
.......मन को संवेदना के दरवाजे पर ले जाकर कहदा कर देती हैं...........
अच्छी रचनाएं ...
आज आपसे मिलना अद्भुद रहा ...
पद्मावलि
बच्चे- "छंद गीत के/ बहर गजल की/ आहट/ आने वाले कल की". बचों की मनोवृत्ति को भलीभांति परखने वाले परम आदरणीय सत्यनारायण जी का यह गीत बहुत सुन्दर बन पड़ा है. यह गीत ही क्याउनके सभी गीत सुन्दर होते हैं. मेरी बधाई स्वीकारें- अवनीश सिंह चौहान
मैंने आपकी वेबसाइट पर प्रकाशित रचनाएँ पढ़ीं। बहुत सुन्दर कविता, कहानियां लगीं।
Capital Bazaar
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